पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२९९

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1 प्रायश्चित्त मदारोलाल के मन में एक बार ऐसा उबाल उठा कि सब कुछ खोल ६ । साफ कह दें, मैं ही वह दुष्ट, वह अधम, वह पामर हूँ। विधवा के पैरों पर गिर पड़ें और कहें, वही छुरी इस हत्यारे को गर्दन पर फेर दो। पर जबान न खुलो , इसो दशा में बैठे-बैठे उनके सिर में ऐसा चक्कर आया कि वे जमीन पर गिर पड़े। (५) तोसरे पहर लाश की परीक्षा समाप्त हुई । अर्थी जलाशय की ओर चली । साग दफ्तर, सारे हुक्काम और हज़ारों आदमी साथ थे। दाह-सस्कार लड़कों को 'करना चाहिए था, पर लड़के नाबालिग्न थे। इसलिए विधवा चलने को तैयार हो रही थी कि मदारीलाल ने जाकर कहा-बहूजी, यह सस्कार मुझे करने दो। तुम क्रिया पर बैठ जाओगी तो बच्चों को कौन संभालेगा। सुबोध मेरे भाई थे। ज़िन्दगी में उनके साथ कुछ सलूक न कर सका, अब ज़िन्दगी के बाद मुझे दोस्ती का कुछ हक अदा कर लेने दो। आखिर मेरा भी तो उन पर कुछ हक्क था ! रामेश्वरी ने रोकर कहा-आपको भगवान् ने बड़ा उदार हृदय दिया है भैयाजी, नहीं तो मरने पर कौन किसको पूछता है । दफ्तर के और लोग जो आधी-आधी रात तक हाथ बांधे खड़े रहते थे, झूठों बात पूछने न आये कि ज़रा ढाढस होता। मदारीलाल ने दाह-सस्कार किया। तेरह दिन तक क्रिया पर बैठे रहे। तेरहवें दिन पिण्डदान हुआ, ब्राह्मणों ने भोजन किया, भिखारियों को अन्नदान किया गया, मित्रों की दावत हुई, और यह सब कुछ मदारीलाल ने अपने खर्च से किया। रामेश्वरी ने वहुत कहा कि आपने जितना किया उतना ही बहुत है, अब मैं आपको और जेरबार नहीं करना चाहती, दोस्ती का हक इससे ज्यादा और कोई क्या अदा करेगा ; मगर मदारीलाल ने एक न सुनी। सारे शहर में उनके यश की धूम मच गई, मित्र हो तो ऐसा हो! सोलहवें दिन विधवा ने मदारीलाल से कहा-भैयाजी, आपने हमारे साथ जो उपकार और अनुग्रह किये हैं, उनसे हम मरते दम उऋण नहीं हो सकते । आपने हमारी पीठ पर हाय न रखा होता, तो न-जाने हमारी क्या गति होती। कहीं रूख की भी छाँह तो नहीं थी। अब हमें घर जाने दीजिए। वहाँ देहात में खर्च भी कम होगा और कुछ खेती-बारो का सिलसिला भी- कर लूंगी। किसी-न-किसी तरह विपत्ति के दिन कट हो जायेंगे। इसी तरह हमारे ऊपर दया रखिएगा। -