पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/३०

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२६ मानसरोवर मोटे०- सरकार, मैं इनका दासानुदास हूँ। चिन्ता०-जगतारिणी, मैं इनका चरण-रज हूँ। मोटे० - रिपुदलसंहारिणीजी, मैं इनके द्वार का कूकर हूँ। रानी-आप दोनों सज्जन पूज्य हैं। एक-से-एक बढ़े हुए। चलिए, भोजन कीजिए। . O- सोनारानी बैठी पण्डित मोटेराम की राह देख रही थीं। पति की इस मित्र- भक्ति पर उन्हें वड़ा क्रोध आ रहा था। बड़े लड़कों के विषय में तो कोई चिन्ता न थी, लेकिन छोटे बच्चों के सो जाने का भय था। उन्हें किस्से-कहानियाँ सुना-सुनाकर बहला रही थीं कि भडारी ने आकर कहा-महाराज चलो । दोनों पण्डितजी आसन पर बैठ गये। फिर क्या था, बच्चे कूद-कूदकर भोजनशाला मे जा पहुँचे । देखा, तो दोनों पण्डित दो वीरों की भाँति आमने-सामने डटे बैठे हैं। दोनों अपना-अपना पुरुषार्थ दिखाने के लिए अधीर हो रहे थे। चिन्ता -भडारीजी, तुम परोसने में बड़ा विलम्ब करते हो । क्या भीतर जाकर सोने लगते हो भडारी-चुपाई मारे बैठे रहो, जौन कुछ होई, सव आय जाई। घबड़ाये का नहीं होत । तुम्हारे सिवाय और कोई जिवैया नहीं बैठा है। मोटे०–भैया, भोजन करने के पहले कुछ देर सुगन्ध का स्वाद तो लो। चिन्ता०-अजी सुगन्ध गया चूल्हे में, सुगन्ध देवता लोग लेते हैं। अपने लोग तो भोजन करते हैं। मोटे० -अच्छा बताओ, पहले किस चीज़ पर हाथ फेरोगे ? चिन्ता० -मैं जाता हूँ, भीतर से सब चीजें एक साथ लिये आता हूँ। मोटे-धीरज धरो भैया, सब पदार्थों को आ जाने दो। ठाकुरजी का भोग तो लग जाय। चिन्ता-तो बैठे क्यों हो, तब तक भोग ही लगाओ। एक बाधा तो मिटे । नहीं, लाओ मैं चटपट भोग लगा दूँ । व्यर्थ देर करोगे। इतने में रानी आ गई। चिन्तामणि सावधान हो गये। रामायण की चौपाइयों कि पाठ करने लगे-