पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/३१

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निमन्त्रण २७ 'रहा एक दिन अवधि अधारा । समुमत मन दुख भयउ अपारा ॥ कौशलेश दशरथ के जाये । हम पितु वचन मानि बन आये ॥ उलटि पलटि लड्का कपि जारी । कूद परा तव सिन्धु मझारी ॥ जेहि पर जाकर सत्य सनेह । ता तेहि मिले न कछु सदेहू ॥ जामवन्त के वचन सुहाए । सुनि हनुमान हृदय अति भाए ।' पण्डित मोटेराम ने देखा कि चिन्तामणि का रग जमता जाता है, तो वे भी अपनी विद्वत्ता प्रकट करने को व्याकुल हो गये। बहुत दिमाग लड़ाया ; पर कोई श्लोक, कोई मन्त्र, कोई कवित्त याद न आया। तब उन्होंने सीधे-सीधे राम-नाम का पाठ आरभ्भ कर दिया- 'राम भज, राम भज, राम भज रे मन'- इन्होंने इतने ऊँचे स्वर से जाप करना शुरू किया कि चिन्तामणि को भी अपना स्वर ऊँचा करना पड़ा। मोटेराम और ज़ोर से गरजने लगे। इतने में भडारीजी ने कहा- महाराज, अव भोग लगा- इए। यह सुनकर उस प्रतिस्पर्धा का अन्त हुआ। भोग की तैयारी हुई। वालवृन्द सजग हो गया। किसी ने घटा लिया, किसी ने घड़ियाल, किसो ने शख, किसी ने करताल, चिन्तामणि ने आरती उठा ली। भोटेराम मन में ऐंठकर रह गये। रानी के समीप जाने का यह अवसर उनके हाथ से निकल गया । पर यह किसे मालूम था कि विधि-वाम उधर कुछ और ही कुटिल क्रीड़ा कर रहा है ? आरती समाप्त हो गई थी, भोजन शुरू होने को ही था कि एक कुत्ता न- जाने किधर से आ निकला। पण्डित चिन्तामणि के हाथ से लड्ड्ट थाल में गिर पड़ा। पण्डित मोटेराम अकचकाकर रह गये । सर्वनाश । चिन्तामणि ने मोटेराम से इशारे में कहा-अव क्या करते हो मित्र कोई उपाय निकालो, यहाँ तो कमर टूट गई। मोटेराम ने लम्वी सांस खींचकर कहा-अब क्या हो सकता है ? यह ससुर आया किधर से ? रानो पास ही खड़ी थीं, उन्होंने कहा-अरे, कुत्ता किधर से आ गया ? यह तो रोज़ बंधा रहता था, आज कैसे छूट गया ? अब तो रसोई भ्रष्ट हो गई। चिन्ता-सरकार, आचार्यों ने इस विषय में... मोटे०-कोई हर्ज नहीं है, सरकार, कोई हर्ज नहीं है ।