पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/४२

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३८ मानसरोवर हानि हुई, लेकिन मेरा अन्तःकरण उस समय विप्लवकारी विचारों से भरा हुआ था। मेरे पास दो आने पैसे पड़े हुए थे। मैंने पैसे उठा लिये, और जाकर शरमाते- शरमाते रामचन्द्र को दे दिये। उन पैसों को देखकर रामचन्द्र को जितना हर्ष हुआ, वह मेरे लिए आशातीत था। टूट पड़े, मानो प्यासे को पानी मिल गया । वही दो आने पैसे लेकर तीनों मूर्तियाँ विदा हुई। केवल मैं ही उनके साथ कस्बे के वाहर तक पहुँचाने आया । उन्हें बिदा करके लौटा, तो मेरी आँखें सजल थीं , पर हृदय आनन्द से उमड़ा हुआ था।