पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/६०

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मानसरोवर से इतना C तपने लगा। खस को टट्टियों और तहखानों में रहनेवाले राजकुमार का चित्त गरमी बेचैन हुआ कि वह वाहर निकल आये और सामने के वान में जाकर एक घने वृक्ष की छाँह में बैठ गये। सहसा उन्होंने देखा- चन्दा नदी से जल की गागर लिए चली आ रही है। नीचे जलती हुई रेत थी, ऊपर जलता हुआ सूर्य । लू से देह झुलसी जाती थी। कदाचित् इस समय प्यास से तड़पते हुए आदमी की भी नदी तक जाने की हिम्मत न पड़ती। चन्दा क्यों जल लेने गई थी? घर में पानी भरा हुआ है । फिर इस समय वह क्यों पानी लेने निकली ? कुँअर दौड़कर उसके पास पहुंचे और उसके हाथ से गागर छीन लेने की चेष्टा करते हुए बोले - मुझे दे दो और भागकर छाँह मे चली जाओ । इस समय पानी का क्या काम था ? चन्दा ने गागर न छोड़ी। सिर से खिसका हुआ अञ्चल सँभालकर बोली-तुम इस समय कैसे आ गये ? शायद मारे गरमी के अन्दर न रह सके ! कुँअर-मुझे दे दो, नहीं मैं छीन लूँगा। चन्दा ने मुसकिराकर कहा-राजकुमारों को गागर लेकर चलना शोभा नहीं देता। कुँअर ने गागर का मुँह पकड़कर कहा-इस अपराध का बहुत दंड सह चुका हूँ। चन्दा, अव तो अपने को राजकुमार कहने में भी लज्जा आती है। चन्दा-देखो, धूप में खुद हैरान होते हो और मुझे भी हैरान करते हो । गागर छोड़ दो। सच कहती हूँ, पूजा का जल है । कुँअर - क्या मेरे ले जाने से पूजा का जल अपवित्र हो जायगा ? चन्दा-अच्छा भाई, नहीं मानते, तो तुम्हीं ले चलो। हाँ नहीं तो! कुँअर गागर लेकर आगे-अगे चले । चन्दा पीछे हो ली। बगीचे में पहुंचे, तो चन्दा एक छोटे-से पौधे के पास रुककर बोली-इसी देवता की पूजा करनी है, गागर रख दो । कुँअर ने आश्चर्य से पूछा-यहाँ कौन देवता है, चन्दा ? मुझे तो नहीं नजर आता। चन्दा ने पौधे को सींचते हुए कहा-यही तो मेरा देवता है ! पानी पाकर पौधे की मुरझाई हुई पत्तियाँ हरी हो गई, मानो उनकी आँखें खुल गई हों। कुँअर ने पूछा-यह पौधा क्या तुमने लगाया है, चन्दा !