पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/७१

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कामना-तरु ६५ है, मानो कोई कलेजे को मसोस रहा हो। मैं तो कभी-कभी पड़े-पड़े रो दिया करता हूँ। सब लोग कहते हैं कि यह वही चन्दा है। अब भी कुँअर के वियोग में विलाप कर रही है। मुझे भी ऐसा ही जान पड़ता है। आज न-जाने क्यों मगन है ? किसान तम्बाकू पोकर सो गया। कुंअर कुछ देर तक खोये हुए से खड़े रहे। फिर धीरे से बोले-चन्दा, क्या सचमुच तुम्ही हो ? मेरे पास क्यों नहीं आती ? एक क्षण में चिड़िया आकर उनके हाथ पर बैठ गई। चन्द्रमा के प्रकाश में कुँअर ने चिड़िया को देखा। ऐसा जान पड़ा, मानो उनकी आँखें खुल गई हो, मानो आंखों के सामने से कोई आवरण हट गया हो। पक्षी के रूप में भी चन्दा की मुखाकृति अङ्कित थी। दूसरे दिन किसान सोकर उठा, तो कुंअर को लाश पड़ी हुई थी। (८) कुँअर अव नहीं हैं, किन्तु उनके झोपड़े की दीवार वन गई हैं, ऊपर फूम का नया छप्पर पड़ गया है और झोपड़े के द्वार पर फूलों को कई क्यारियां लगी हुई हैं। गांव के किसान इससे अधिक और क्या कर सकते थे ? उस झोपड़े में अव पक्षियों के एक जोड़े ने अपना घोंसला बनाया है। दोनों साथ-साथ दाने-चारे की खोज में जाते हैं, साथ-साथ आते हैं, रात को दोनों उसी वृक्ष की डाल पर बैठे दिखाई देते हैं। उनका सुरम्य सगीत रात की नीरवता मे दूर तक सुनाई देता है। वन के जीव-जतु वह स्वर्गीय गान सुनकर मुग्ध हो जाते है। यह पक्षियों का जोड़ा कुँअर और चन्दा का जोड़ा है, इसमें किसी को सन्देह नहीं है। एक बार एक व्याध ने इन पक्षियों को फंसाना चाहा, पर गांव ने उसे मारकर भगा दिया।