पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/७२

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सती

%3 दो शताब्दियों से अधिक वीत गये हैं ; पर चिन्तादेवी का नाम चला जाता है। बुन्देलखण्ड के एक बीहड़ स्थान में आज भी मगलवार को सहस्रों स्त्री-पुरुष चिन्तादेवी की पूजा करने आते हैं। उस दिन यह निर्जन स्थान सोहाने गीतों से गूंज उठता है, टीले और टोकरे रमणियों के रग-विरगे वस्त्रों से सुशोभित हो जाते हैं। देवी का मन्दिर एक बहुत ऊँचे टीले पर बना हुआ है। उसके कलश पर लहराती हुई लाल पताका बहुत दूर से दिखाई देती है। मन्दिर इतना छोटा है कि उसमें मुश्किल से एक साथ दो आदमी समा सकते हैं। भीतर कोई प्रतिमा नहीं है, केवल एक छोटी-सी वेदी बनी हुई है। नीचे से मन्दिर तक पत्थर का जीना है। भीड़-भाड़ में धक्का खाकर कोई नीचे न गिर पड़े, इसलिए जीने के दोनों तरफ दीवार बनी हुई है। यहीं चिन्तादेवी सती हुई थीं ; पर लोकरीति के अनुसार वह अपने मृत-पति के साथ चिता पर नहीं बैठी थीं। उनका पति हाथ जोड़े सामने खड़ा था, पर वह उसकी ओर आंख उठाकर भी न देखती थीं। वह पति के शरीर के साथ नहीं, उसकी आत्मा के साथ सती हुई। उस चिता पर पति का शरीर न था, उपकी मर्यादा भस्मीभूत हो रही थी। ( २ ) यमुना-तट पर कालपी एक छोटा-सा नगर है। चिन्ता उसी नगर के एक वीर वुन्देले की कन्या थी। उसकी माता उसकी बाल्यावस्था में ही परलोक सिधार चुकी थीं। उसके पालन-पोषण का भार पिता पर पड़ा। वह सग्राम का समय था, योद्धाओं को कमर खोलने की भी फुरसत न मिलती थी, वे घोड़े की पीठ पर भोजन करते और जीने ही पर झपकियां ले लेते थे। चिन्ता का बाल्यकाल पिता के साथ समर- भूमि में कटा । बाप उसे किसी खोह में या वृक्ष की आड़ में छिपाकर मैदान में चला जाता । चिन्ता निश्शक भाव से बैठी हुई मिट्टी के किले बनाती और विगाड़ती ।