पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/८९

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हिंसा परमो धर्मः ८५ । साथ करेंगे। फिर हम तो बे-आवरू नहीं करते, सिर्फ अपने मज़हब में शामिल करते हैं । इस्लाम कबूल करने से आबरू बढ़ती है, घटती नहीं। हिन्दू कौम ने तो हमें मिटा देने का बीड़ा उठाया है। वह इस मुल्क से हमारा निशान मिटा देना चाहती है। धोखे से, लालच से, जब से मुसलमानों को बेदीन बनाया जा रहा है, तो क्या मुसलमान बैठे मुंह ताकेंगे ? औरत-हिन्दू कभी ऐसा अत्याचार नहीं कर सकता। सम्भव है, तुम लोगों को शरारतों से तग आकर नीचे दर्जे के लोग इस तरह बदला लेने लगे हों , मगर अव भी कोई सच्चा हिन्दू इसे पसन्द नहीं करता। काजी साहव ने कुछ सोचकर कहा-बेशक, पहले इस तरह की शरारतें मुसल- मान शोहदे किया करते थे। मगर शरीफ लोग इन हरकतो को बुरा समझते थे, और अपने इमकान-भर रोकने की कोशिश करते थे। तालीम और तहजोव की तरक्की के साथ कुछ दिनों में यह गुण्डापन जरूर गायव हो जाता ; मगर अब तो सारी हिन्दू कौम हमे निगलने के लिए तैयार बैठी हुई है। फिर हमारे लिए और रास्ता हो कौन-सा है । हम कमजोर हैं , इसलिए हमें मज़बूर होकर अपने को कायम रखने के लिए दगा से काम लेना पड़ता है, मगर तुम इतना घबराती क्यो हो ? तुम्हें यहाँ किसी बात की तकलीफ न होगी। इसलाम औरतों के हक्क का जितना लिहाज करता है, उतना और कोइ मज़हब नहीं करता। और मुसलमान मर्द तो अपनी औरत पर जान देता है । मेरे यह नौजवान दोस्त ( जामिद ) तुम्हारे सामने खड़े हैं, इन्हीं के साय तुम्हारा निकाह कर दिया जायगा । बस, आराम से ज़िन्दगी के दिन बसर करना। औरत-मैं तुम्हें और तुम्हारे धर्म को घृणित समझती हूँ। तुम कुत्ते हो । इसके सिवा तुम्हारे लिए कोई दूसरा नाम नहीं । खैरियत इसी में है कि मुझे जाने दो, नहीं तो मैं अभी शोर मचा दूंगी, और तुम्हारा सारा मौलवीपन निकल जायगा। क़ाज़ी - अगर तुमने ज़बान खोली,, तो तुम्हें जान से हाथ धोना पड़ेगा। बस, इतना समझ लो। औरत-आवरू के सामने जान की कोई हकीकत नहीं। तुम मेरी जान ले सकते हो , मगर आवरू नहीं ले सकते । क़ाज़ी-क्यों नाहक ज़िद करती हो ? औरत ने दरवाजे के पास जाकर कहा-मैं कहती हूँ, दरवाज़ा खोल दो।