पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/८८

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८४ मानसरोवर -- तांगेवाले-ओ साहब, आवाज क्या दू, जव जानता हूँ कि साहब का मकान यही है, तो नाहक चिल्लाने से क्या फायदा ? बेचारे आराम कर रहे होंगे। आराम में खलल पड़ेगा। आप निसाखातिर रहिए। चलिए, ऊपर चलिए । औरत ऊपर चली। पीछे-पीछे तांगेवाला असबाब लिये हुए चला । जामिद गुम- शुम नीचे खड़ा रहा । यह रहस्य उसकी समझ मे न आया। तांगेवाले की आवाज़ सुनते ही काज़ी साहब छत पर निकल आये, और एक औरत को आते देख कमरे की खिड़कियां चारों तरफ से बन्द करके खूटी पर लट- कती तलवार उतार ली, और दरवाजे पर आकर खड़े हो गये । औरत ने जीना तय करके ज्योंही छत पर पैर रखा कि काजी साहव को देख- कर झिझकी। वह तुरन्त पीछे की तरफ मुड़ना चाहती थी कि काजी साहब ने लपककर उसका हाथ पकड़ लिया, और अपने कमरे में घसीट लाये। इसी बीच में जामिद और तांगेवाला, ये दोनों भी ऊपर आ गये थे। जामिद यह दृश्य देखकर विस्मित हो गया था। यह रहस्य और भी रहस्यमय हो गया था। यह विद्या का सागर, यह न्याय का भाडार, यह नीति, धर्म और दर्शन का आगार, इस समय एक अपरिचित महिला के ऊपर यह घोर अत्याचार कर रहा है। तांगेवाले के साथ वह भी क़ाज़ी साहब के कमरे में चला गया। काज़ी साहब तो स्त्री के दोनों हाथ पकड़े हुए थे। तांगेवाले ने दरवाजा बन्द कर दिया। महिला ने तांगेवाले की ओर खून-भरी आँखों से देखकर कहा-तू मुझे यहाँ क्यों लाया ? काज़ी साहब ने तलवार चमकाकर कहा- पहले आराम से बैठ जाओ, सब कुछ मालूम हो जायगा। औरत-तुम तो मुझे कोई मौल्बी मालूम होते हो ? क्या तुम्हें खुदा ने यही सिखाया है कि पराई बहू-बेटियों को जबरदस्ती घर में धन्द करके उनकी आवरु विगाड़ो ? काज़ी-हाँ, खुदा का यही हुक्म है कि काफिरों को जिस तरह मुमकिन हो, इस्लाम के रास्ते पर लाया जाय । अगर खुशी से न आयें, तो जब से। औरत- इसी तरह अगर कोई तुम्हारी बहू-बेटी पकड़कर बे-आवरू करे, तो काजी-हो ही रहा है। जैसा तुम हमारे साथ करोगे, वैसा ही हम तुम्हारे