पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/९३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


८९ ने आँचल से मुंह छिपा लिया और कलमा ल्न चलनेह केहि बहिष्कार ने इस तरह घर से निकाला, जैसे कोई कुत्ते को निकाले । बेचारी गाँव के बाहर बैठी रो रही है। कौन कह सकता है, कहाँ जायगी। शायद मायके मे भी कोई नहीं रहा। सोमदत्त के डर के मारे गांव का कोई आदमी उसके पास भी नहीं जाता। ऐसे बग्गड़ का क्या ठिकाना ! जो आदमी स्त्री का न हुआ, वह दूसरे का क्या होगा। उसकी दशा देखकर मेरी आँखों में तो आँसू भर आये । जी में तो आया, कहूँ- वहन, तुम मेरे घर चलो , मगर तब तो सोमदत्त मेरे प्राणो का गाहक हो जाता । गोविन्दी-तुम ज़रा जाकर एक बार फिर समझाओ। अगर वह किसी तरह न माने, तो कालिन्दी को लेते आना। ज्ञान- -जाऊँ? गोविन्दी-हाँ, अवश्य जाओ , अगर सोमदत्त कुछ खरी-खोटी भी कहे, ते ज्ञानचन्द्र ने गोविन्दी को गले लगाकर कहा-तुम्हारे हृदय में बड़ी दर है गोविन्दी ! लो जाता हूँ, अगर सोमदत्त न माना, तो कालिन्दी है को लेन आऊँगा। अभी बहुत दूर न गई होगी। ( २ ) तीन वर्ष बीत गये । गोविन्दी एक बच्चे की मा हो गई । इलिई क इसी घर मे है । उसके पति ने दूसरा विवाह कर लिया है। इन्हें करेन्द में बहनों का-सा प्रेम है। गोविन्दी सदैव उसकी दिलईकन्तगई है : ४ इसकी कल्पना भी नहीं करती कि यह कोई गैर है गैर ने कराई हुई है। लेकिन सोमदत्त को कालिन्दी का यहां रहना एक आंच व्हेनत? कानूनी काररवाई करने की तो हिम्मत नहीं रखता । और इसलियत में ही क्य मकता है , लेकिन ज्ञानचन्द्र का सिर नीचा करने के लिए कम सुनता रहता है। सन्ध्या का समय था। नीम की उण वायु ल बिल कान्त हुई थी। गोविन्दी गङ्गा-जल भरने गई थी। और लट नौतल लि का आनन्द उठा रही थी। सहसा उसे मोमदन माता का दिनई दिया सुन लेना। > hy सामने आकर कहा-जरा व्हरो गोविन्दा, दुमई करता पूछना चाहता हूँ कि तुमसे कहूँ या जान ने !