पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/९४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


So मानसरोवर गोविन्दी ने धीरे से कहा- उन्हीं से कह दीजिए। सोम० -जी तो मेरा भी यही चाहता है, लेकिन तुम्हारी दोनता पर दया आती है। जिस दिन मैं ज्ञानचन्द्र से वह बात कह दूंगा, तुम्हे इस घर से निकलना पड़ेगा । मैंने सारी बातो का पता लगा लिया है। तुम्हारा वाप कौन था, तुम्हारी मा की क्या दशा हुई, यह सारी कथा जानता हूँ। क्या तुम समझतो हो कि ज्ञानचन्द्र यह कथा सुनकर तुम्हे अपने घर में रखेगा ? उसके विचार कितने ही स्वाधीन हो, पर जीती मक्खी नहीं निगल सकता। गोविन्दी ने थरथर कांपते हुए कहा--जब आप सारी बातें जानते हैं, तो में क्या कहूँ ? आप जैसा उचित समझ, करें , लेकिन मैने तो आपके साथ कभी कोई वुराई नहीं की। सोम० -तुम लोगो ने गांव में मुझे कहीं मुँह दिखाने के योग्य नहीं रखा। तिस पर कहती हो, मैंने तुम्हारे साथ कोई बुराई नहीं की ! तीन साल से कालिन्दी को आश्रय देकर तुमने मेरी आत्मा को जो कष्ट पहुँचाया है, वह मैं ही जानता हूँ। तीन साल से मैं ऐसी फिक्र में था कि कैसे इस अपमान का दण्ड दूं। अब वह अव- सर पाकर उसे किसी तरह नहीं छोड़ सकता। गोविन्दी - अगर आपकी यही इच्छा है कि मैं यहाँ न रहूँ, तो मैं चली जाऊँगो, आन ही चली जाऊँगी , लेकिन उनसे आप कुछ न कहिए । आपके पैरों पड़ती हूँ। सोम-कहाँ चली जाओगी? गोविन्दो-और कहीं ठिकाना नहीं है, तो गङ्गाजी तो हैं। सोमः नही गोविन्दी, मैं इतना निर्दयी नहीं हूँ। मैं केवल इतना चाहता हूँ कि तुम कालिन्दी को अपने घर से निकाल दो और मैं कुछ नहीं चाहता । तीन दिन का समय देता हूँ, खूब सोच-विचार लो । अगर कालिन्दी तीसरे दिन तुम्हारे घर से न निकली, तो तुम जानोगी। सोमदत्त वहाँ से चला गया। गोविन्दी कलसा लिये मूर्ति की भौति खड़ी रह गई । उसके सम्मुख कठिन समस्या आ खड़ी हुई थी, वह थी कालिन्दी ! घर में एक ही रह सकती थी। दोनों के लिए उस घर में स्थान न था। क्या कालिन्दी के लिए वह अपना घर, अपना स्वर्ग त्याग देगी ? कालिन्दी अकेली है, पति ने उसे