पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/१०

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        यह मेरी मातृभूमि       ११

भारत है और इसी के दर्शनो की मेरी उत्कट इच्छा थी तथा इसी की पवित्र धूलि के कण बनने की मेरी प्रबल अभिलाषा है।"

           (५)

मैं विशेष आनन्द में मग्न था। मैंने अपना पुराना कोट और पतलून उतारकर फेंक दिया और गङ्गा माता की गोद में जा गिरा, जैसे कोई भोला- भाला बालक दिन-भर निर्दय लोगों के साथ रहने के बाद सन्ध्या को अपनी प्यारी माता की गोद में दौड़कर चला आये और उसकी छाती से चिपट जाय । हाँ, अब मैं अपने देश में हूँ। यह मेरी प्यारी मातृभूमि है। ये लोग मेरे भाई हैं और गङ्गा मेरी माता है।

मैंने ठीक गङ्गा के किनारे एक छोटी-सी कुटी बनवा ली है। अब मुझे सिवा राम-नाम जपने के और कोई काम नहीं है । मैं नित्य प्रातः-साय गंगास्नान करता हूँ और मेरी प्रबल इच्छा है कि इसी स्थान पर मेरे प्राण निकलें और मेरी अस्थियों गङ्गा माता की लहरी की भेंट हों।

मेरी स्त्री और मेरे पुत्र बार-बार बुलाते हैं ; मगर अब मैं यह गङ्गा माता का तट और अपना प्यारा देश छोड़कर वहाँ नहीं जा सकता। मैं अपनी मिट्टी गङ्गाजी को ही सौंपूँगा । अब संसार की कोई आकाक्षा मुझे इस स्थान से नहीं हटा सकती, क्योंकि यह मेरा प्यारा देश और यही प्यारी मातृभूमि है। बस, मेरी उत्कट इच्छा यही है कि मैं अपनी प्यारी मातृभूमि मे ही अपने प्राण विसर्जन करूँ।

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