पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/९

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१०        मानसरोवर

सफेद घोतियाँ पहिने, हाथों में लोटे लिये स्नान को जा रही हैं और गाती जाती हैं- "हमारे प्रभु, अवगुन चित न धरो-" मैं इस गीत को सुनकर तन्मय हो ही रहा था कि इतने में मुझे बहुत आदमियों की बोलचाल सुन पड़ी। उनमें से कुछ लोग हाथों में पीतल के कमण्डलु लिये हुए शिव-शिव, हर-हर, गङ्गे गङ्गे, नारायण नारायण आदि शब्द बोलते हुए चले जाते थे । आनन्द दायक और प्रभावोत्पादक राग से मेरे हृदय पर जो प्रभाव हुआ, उसका वर्णन करना कठिन है।

मैंने अमेरिका की चञ्चल से-चञ्चल और प्रसन्न-से-प्रसन्न चित्तवाली लावण्यवती स्त्रियों की आवाज सुनी था, सहस्रों बार उनकी जिह्वा से प्रेम और प्यार के शब्द सुने थे, हृदयाकर्षक वचनों का आनन्द उठाया था, मैंने सुरीले पक्षियों का चहचहाना भी सुना था, किन्तु जो आनन्द , जो मजा और जो सुख मुझे इस राग में आया, वह मुझे जीवन में कभी प्राप्त नहीं हुआ था। मैंने खुद गुनगुनाकर गाया-

"हमारे प्रभु, अवगुन चित न धरो-" मेरे हृदय में फिर उत्साह आया कि ये तो मेरे प्यारे देश की ही बातें हैं। आनन्दातिरेक से मेरा हृदय आनन्दमय हो गया । मैं भी इन श्रादमियों के साथ हो लिया और ६ मील तक पहाड़ी मार्ग पार करके उसी नदी के किनारे पहुंचा, जिसका नाम पतित पावनी है, जिसकी लहरों में दुबकी लगाना और जिसकी गोद में मरना प्रत्येक हिन्दू अपना परम सौभाग्य समझता है। पतित-पावनी भागीरथी गङ्गा मेरे प्यारे गाँव से छ सात मील पर बहती थीं। किसी समय में घोड़े पर चढ़कर गङ्गा माता के दर्शनों की लालसा मेरे हृदय में सदा रहती थी। यहाँ मैंने हजारों मनुष्यों को इस ठण्डे पानी में डुबकी लगाते हुए देखा | कुछ लोग बालू पर बैठे गायत्री मन्त्र जप रहे थे । कुछ लोग हवन करने में सलम थे। कुछ माथे पर तिलक लगा रहे थे और कुछ लोग सत्वर वेद मंत्र पढ़ रहे थे । मेरा हृदय फिर उत्साहित हुआ और मैं जोर से कह उठा -"हाँ, हाँ, यही मेरो प्यारा देश है, यही मेरी पवित्र मातृभूमि है, यही मेरा सर्वश्रेष्ठ