पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/१०२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


मृत्यु के पीछे ११६ ईश्वरचन्द्र-जीवन का उद्देश्य केवल धन-संचय करना ही नहीं है। मानकी-अभी तुमने वकीलों की निन्दा करते हुए कहा, यह लोग दूसरों की कमाई खाकर मोटे होते हैं। पत्र चलानेवाले भी तो दूसरों की ही कमाई खाते है। ईश्वरचन्द्र ने बगले झाँकते हुए कहा-हम लोग दूसरों की कमाई खाते हैं, तो दूगगे पर जान भी देते हैं । वकीलों की भाँति किसी को लूटते नहीं । मानकी -यह तुम्हारी हठधर्मी है। वकील भी तो अपने मुवक्किलों के लिए जान लढा देते है। उनकी कमाई भी उतनी ही है, जितनी पत्रवालों की। अन्तर केवल इतना है कि एक की कमाई पहाडी सोता है, दूसरे की बरसाती नाला । एक में नित्य जलप्रवाह होता है, दूसरे मे नित्य धूल उड़ा करती है। बहुत हुप्रा. तो बरसात में घड़ी दो घड़ी के लिए पानी या गया । ईश्वर० - पहले तो म यही नहीं मानता कि वकीलों की कमाई हलाल है, और यह मान भी लँ तो यह किसी तरह नहीं मान सकता कि सभी वकील फूलों की सेज पर सोते हैं। अपना-अपना भाग्य सभी जगह है। कितने ही वकील हैं जो झूठी गवाहियाँ देकर पेट पालते हैं। इस देश में समाचार-पत्रों का प्रचार अभी बहुत कम है, इसी कारण पत्रसचालकों की आर्थिक दशा अच्छी नहीं है । यूरोप और अमरीका में पत्र चलाकर लोग कराह रति हा गये हैं। इस समय संमार के सभी समुन्नत देशो के सूत्रधार या तो समाचारपत्रों के सम्मादक और लेखक हैं. या पत्रों के स्वामी । ऐसे कितने ही परवति है, जिन्होंने अपनी सम्पत्ति की नींव पत्रों पर ही खड़ी की थी ...." ईश्वरचन्द्र सिद्ध करना चाहते थे कि धन, स्वाति और सम्मान प्राप्त करने का पत्रसबालन से उत्तम और कोई साधन नहीं है, और सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस जीवन में सत्य और न्याय की रक्षा करने के मच्चे अवसर मिलते हैं, परन्तु मानकी पर इस वक्तृता का जरा असर न टुया। स्थूल दृष्टि को दूर की चीजें साफ नहीं दीसती । मानकी के सामने सफल सम्पादक का कोई उदाहरण न था। १६ वर्ष सुज़र गये । ईश्वरचन्द्र ने सम्पादकीय जगत् मे .यूब नाम पैदा