पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/१४२

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आभूषण १५५ में एक गठगे। शरीर दुर्वल, कपटे मैले, दादी के बाल बढे हुए, मुख पीला. जैसे कोई कैदी जेल से निकलकर आया हो। दीपक का प्रकाश देखकर वह शीतला के कमरे की तरफ चले । मैना पिंजरे में तड़फड़ाने लगी। शीतला ने चौंककर मिर उठाया । घबराबर बोली-"कौन फिर पहचान गयी। नंग फूल को एक कपडे से छिपा दिया। उठ खड़ी हुई और सिर पुकाकर पूछा- इतनी जल्दी सुध ली? विमल ने कुछ जवाब न दिया । विस्मित हो होकर कभी शीतला को देखता और कभी घर को मानों किसी नये संसार में पहुंच गया है। यह वह श्रध-खिला फूल न था । जिसकी खुदियों अनुकूल जलवायु न पाकर सिमट गयी थीं। यह पूर्ण विकसित कुसुम था-ओस के जल-कणों से जगमगाता और वायु के झोकों से लहराता हुअा। विमल उसकी सुदरता पर पहले भी मुग्ध था; पर यह ज्योति वह अनिवाला थी, जिससे हृदय में ताप श्रीर आँखों में जलन होती थी । ये प्राभूषण, ये वसा, या सजावट ! उससे सिर में एक चकर-सा श्रा गया। ज़मीन पर बैठ गया। इस सूर्यमुखी के सामने बैठते हुए उसे जा पाती थी। शीतला अभी तक स्तंभित खड़ी थी। वह पानी लाने नहीं दौड़ी, उसने पति के चरण नहीं धोये, उटके पखा तक नहीं भला। तबुद्धि सी हो गयी थी। उसने कल्पनायो की केसी नुरम्य वाटिका लगाई यी ! उस पर तुपार पड़ गया । वास्तव में इस मलिनवदन, अर्धनम पुरुप से उसे घृणा हो रही थी। यह घर का जमीदार विमल न था। वह मजदूर हो गया था । मोटा काम मुखाकृति पर असर डाले विना नहीं रहता । मजदूर सुंदर वस्त्रों में भी मज़दूर ही रहता है । सहसा विमल की मो चौकी। शातला के कमरे में पायी, तो विमल को दंसते ही मातृ स्नेह से विहुल होकर उसे छाती से लगा लिया । विमल ने उस चरण। पर सिर रखा। उसकी आँखों से मातुओ का गरम-गरम बूंदे निपल रही थी । मो पुलकित हो रही यो । मुस से बात न निकलती थी। एक क्षण में विमल ने कहा--अम्मा! फट-बान ने उसाप्राशय प्रकट कर दिया। मो ने प्रश्न समझकर कहा- नहीं चटा, यह बात नहीं है। 3