पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/१७

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२० मानसरोवर

भोजन बनाया था, कितनी प्रतीक्षा के बाद यह शुभ दिन आया था, उसके उल्लास का कोई पारावार न था, पर राजा के तेवर देखकर उसके प्राण सूख गये । जब राजा उठ गये और उसने थाल को देखा, तो कलेजा वक् से हो गया और पैरों तले से मिट्टी निकल गयी। उसने सिर पीट लिया-ईश्वर ! आज रात कुशलतापूर्वक कटे, मुझे शकुन अच्छे दिखाई नहीं देते ।

राजा जुझारसिंह शीश महल में लेटे। चतुर नाइन ने रानी का शृङ्गार किया और वह मुस्कुराकर बोली-कल महाराज से इसका इनाम लूंगी। यह कहकर वह चली गयी , परन्तु कुलीना वहाँ से न उठी। वह गहरे सोच में पड़ी हुई थी। उनके सामने कौन सा मुँह लेकर जाऊँ ? नाइन ने नाहक मेरा शृङ्गार कर दिया । मेरा शृङ्गार देखकर वे खुश भी होगे ? मुझसे इस समय अपराध हुआ है, मैं अपराधिनी हूँ, मेरा उनके पास इस समय बनाव-शृङ्गार करके जाना उचित नहीं, नहीं, आज मुझे उनके पास भिखारिनी के भेप में जाना चाहिए । मैं उनमे क्षमा मागूंगी । इस समय मेरे लिए यही उचित है। यह सोचकर रानी बड़े शीशे के सामने खड़ी हो गयी । वह अप्सरा सी मालूम होती थी । सुन्दरता की कितनी ही तसवीर उसने देखी थीं, पर उसे इस समय शीशे की तसवीर सबसे ज्यादा खूबसूरत मालूम होती थी।

सुन्दरता और आत्मरुचि का साथ है । हल्दी बिना रङ्ग के नहीं रह सकती। थोड़ी देर के लिए कुलीना सुन्दरता के मद से फूल उठी। वह तनकर खड़ी हो गयी । लोग कहते है कि सुन्दरता में जादू है और वह जादू, जिसका कोई उतार नहीं। धर्म और कर्म, तन और मन सब सुन्दरता पर न्यौछावर है । मैं सुन्दर न सही ऐसी कुरूपा भी नहीं हूँ | क्या मेरी सुन्दरता में इतनी भी शक्ति नहीं है कि महाराज से मेरा अपराध क्षमा करा सके ? ये वाहु-लताएँ जिस समय उनके गले का हार होगी, ये आँखें जिस समय प्रेम के मद से लाल होकर देखेंगी, तब क्या मेरे सौन्दर्य की शीतलता उनकी क्रोधाग्नि को ठंडा न कर देगी ? पर थोड़ी देर में रानी को ज्ञान हुआ । आह यह मैं क्या स्वप्न देख रही हूँ ! मेरे मन में ऐसी बातें क्यों आती है । मैं अच्छी हूँ या बुरी हूँ, उनकी चेरी हूँ। मुझसे अपराध हुआ है, मुझे उनसे क्षमा माँगनी चाहिए। यह शृङ्गार और वनाव इस समय उपयुक्त नहीं है । यह सोचकर रानी ने सब गहने उतार