पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/१७६

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गृह-दाह १६२ माता के वन के-से शब्द कानो में गूंजने लगने । हाय ! उसी वज़ ने मेरा सर्वनाश कर दिया। फिर ऐसी कितनी ही घटनाएँ याद आती। अब चिना किसी अपराध के माँ डाँट बताती । पिता का निर्दय, निष्ठुर व्यवहार याद श्राने लगता। उनका बात-बात पर तिउरियों बदलना, माता के मिथ्यापवादों पर विश्वास करना-हाय ! मेरा सारा जीवन नष्ट हो गया तब वह करवट बदल लेता और फिर वही दृश्य आँखों मे फिरने लगते । फिर करवट बदलता और चिल्लाकर कहता-इस जीवन का अन्त क्यों नहीं हो जाता! इस भाँति पटे पड़े उसे कई दिन दो गये । सन्ध्या हो गयी यी कि सहसा उसे द्वार पर किसी के पुकारने की आवाज सुनायी पड़ी। उसने कान लगाकर सुना और चौक पड़ा। किसी परिचित मनुष्य की आवाज थी। दौड़ा द्वार पर श्राया, तो देखा, शानप्रकाश खड़ा है। कितना रूपवान् पुरुप था! वह उसके गले से लिपट गया । ज्ञानप्रकाश ने उसके पैरों को स्पर्श किया। दोनों भाई घर में आये । अन्धकार छाया हुआ था । घर की यह दशा देखकर बानप्रकाश, जो अब तक अपने फण्ठ के आवेग का रोके हुए था, रो पड़ा । सत्यप्रकाश ने लालटेन जलाई । घर क्या था, भूत का डेरा था। सत्यप्रकाश ने जल्दी से एक कुरता गले में डाल लिया । ज्ञानप्रकाश भाई का जर्जर शरीर, पीला बुझी हुई आँखें देखता था और रोता था। सत्यप्रकाश ने कहा-मैं अाजकल बीमार हूँ। शानप्रकाश-वह तो देख ही रहा हूँ। सत्य-तुमने अपने प्राने की सूचना भी न दी, मकान का पता कैसे चला! शान०-सूचना तो दी थी, श्रापको पत्र न मिला होगा। हो दी होगी, पत्र दुकान में डाल गया होगा। मैं इधर कई दिनों से दूकान नहीं गया । घर पर सब कुशल है ? -माताजी का देहान्त हो गया। -अरे! क्या बीमार थी। मानल-जी नहीं। मालूम नहीं, क्या सा लिया। इधर उन्हें उन्माद-सा हो गया था। पिताजी ने कुछ कटुवचन कदे थे, शायद हसी पर कुछ सा लिया। सत्य.--पिताजी तो कुशल से हैं ? मुख, सत्य- -अच्छा, मान०- सत्य-