पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/१९८

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चकमा २२३ एक सिपाही-लालाजी, श्रापही ने तो कहा था कि ये दोनों वालंटियर मेरे ग्राहकों को छेड़ रहे हैं। अब आप निकले जाते हैं ? चन्दूमल-बिलकुल झूठ, सरासर झूट, सोलहो पाना झूठ। तुम लोग अपनी कारगुजारी की धुन में इनसे उलझ पड़े । यह वेचारे तो दूकान से बहुत दूर खड़े थे । न किसी से बोलते थे, न चालते थे। तुमने जबरदस्ती ही इन्हें गरदनी देनी शुरू की। मुझे अपना सौदा वेचना है कि किसी से लड़ना है ? दूसरा सिपाही-लालाजी, हो बड़े हुशियार ! मुझसे आग लगवाकर श्राप अलग हो गये। तुम न कहते तो हमें क्या पड़ी थी कि इन लोगों को धक्के देते ? दारोगाजी ने भी हमको ताकीद कर दी थी कि सेठ चन्दूमल की दूकान का विशेष ध्यान रखना । वहाँ कोई वालंटियर न आये। तब हम लोग आये थे। तुम फरियाद न करते, तो दारोगाजी हमारी तैनाती ही क्यो करते ? चन्दूमल-दारोगाजी को अपनी कारगुजारी दिखानी होगी। मैं उनके पास क्यों फरियाद करने जाता ? सभी लोग काग्रेस के दुश्मन हो रहे हैं। थानेवाले तो उनके नाम से ही जलते हैं । क्या मैं शिकायत करता तभी तुम्हारी तैनाती करते? इतने में किसी ने थाने में इत्तिला दी कि चन्दूमल की दूकान पर कान्स्टे- बिलों और वालटियरों में मार-पीट हो गई। काग्रेस के दफ्तर में भी खबर पहुँची । जरा देर में मय सशस्त्र पुलिस के थानेदार और इन्सपेक्टर साहब आ पहुँचे। उधर काग्रेस के कर्मचारी भी दल-बल सहित दौड़े। समूह और बदा । वार बार जयकार की ध्वनि उठने लगी। काग्रेस और पुलिस के नेताओं वाद-विवाद होने लगा। परिणाम यह हुआ कि पुलिसधालों ने दोनों को हिरासत में लिया और थाने की ओर चले। पुलिस अधिकारियों के चले जाने के बाद सेठजी ने काग्रेस के प्रधान से कहा-आज मुझे मालूम हुआ कि ये लोग वालंटियरों पर इतना घोर अत्याचार में करते हैं। प्रधान-तब तो दो वाल टियरों का फँसना व्यर्थ नहीं हुआ। इस विषय अब तो आपको कोई शंका नहीं है ? हम कितने लड़ाक्, कितने द्रोही, कितने शान्तिभंगकारी हैं, यह तो आपको खूब मालूम हो गया होगा ?