पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/२०१

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२२६ मानसरोवर विद्रोह की घोषणा के समान है ! त्याग में सन्यास से इसका महत्व कम नहीं है । आज जिले के सारे हाकिम उनके खून के प्यासे हो रहे हैं। आश्चर्य नहीं कि गवर्नर महोदय को भी इसकी सूचना दी गई हो । प्रधान- और कुछ नहीं तो उन्हें नियम का पालन करने के लिए प्रतिशा- पत्र पर हस्ताक्षर कर देना चाहिए था। किसी तरह उन्हें यहाँ बुलाहए। अपनी बात तो रह जाय। मन्त्री-वह बड़ा श्रात्माभिमानी है, कभी न आयेगा। बल्कि हम लोगों की ओर से इतना अविश्वास देखकर सम्भव है कि फिर उस दल में मिलने की चेष्टा करने लगे। प्रधान-अच्छी बात है, आपको उन पर इतना विश्वास हो गया है तो उनकी दूकान को छोड़ दीजिए । तव भी मैं यही कहूँगा कि आपको स्वयं मिलने के बहाने से उन पर निगाह रखनी होगी। मन्त्री-आप नाहक इतना शक करते हैं। नौ बजे सेठ चन्दूमल अपनी दूकान पर आये तो वहाँ एक मी वालटियर न था । मुख पर मुस्कराहट को झलक आई । मुनीम से बोले-कौड़ी चित पड़ी। मुनीम-मालूम तो होता है । एक महाशय भी नहीं पाये। चन्दूमल-न पाये और न आयेंगे । वाजी अपने हाथ रही। कैसा दाँव खेला-चारों खाने चित । चन्दू- o-श्राप भी बातें करते हैं ? इन्हें दोस्त बनाते कितनी देर लगती है । कहिए, अभी बुलाकर जूतियाँ सीधी करवाऊँ । टके के गुलाम हैं, न किसी के दोस्त, न किसी के दुश्मन । सच कहिए, कैसा चकमा दिया है ? मुनीम-बस, यही जी चाहता है कि आपके हाथ चूम लें । साँप भी मरा और लाठी भी न टूटी । मगर काग्रेसवाले भी टोह में होंगे। चन्दूमल-तो मैं भी तो मौजूद हूँ। वह हाल-हाल चलेंगे, तो मैं पात- पात चलूँगा । विलायती कपड़े की गाँठ निकलवाइए और व्यापारियों को देना शुरू कीजिए । एक अठवारे में बेड़ा पार है।