पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/२४१

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२६४ मानसरोवर माघोदास ने कहा-ये फौज के सिपाही हैं। जबसे राजा बख्तावरसिंह नजर-बन्द हुए हैं, इन पर किसी की दाब ही नहीं रही। खुले साँड़ की तरह बाजारों में चक्कर लगाया करते हैं। सरकार से तलब मिलने का कुछ ठीक तो है नहीं । बस, नोच-खसोट करके गुजर करते हैं । हाँ, तो फिर अगर मरजी हो, तो मेरे साथ घर तक चलिए, श्रापको माल दिखाऊँ । सौदागर- नहीं भई, इस वक्त नहीं । सुबह आऊँगा। देर हो गयी है, और मुझे भी यहाँ की हालत देखकर खो मालूम होने लगा है । यह कहकर सौदागर उसी तरफ चला गया, जिधर वे तीनों राजपूत गये थे। थोड़ी देर में तीन आदमी और सराफ़े में आये। एक तो पण्डितों की तरह नीची चपकन पहने हुए था, सिर पर गोल पगिया थी और कधे पर जरी के काम का शाल । उनके दोनों साथी ख़ितमतगारों के-से कपड़े पहने हुए थे। तीनों इस तरह इधर-उधर ताक रहे थे, मानों किसी को खोज रहे हो । यों ताकते हुए तीनों आगे चले गये। ईरानी सौदागर तीव्र नेत्रों से इधर-उधर देखता हुआ एक मील चला गया । वहाँ एक छोटा-सा बाग था । एक पुरानी मसजिद भी थी। सौदागर वहाँ ठहर गया । एकाएक तीनो राजपूत मसजिद से बाहर निकल आये और बोले-हुजूर तो बहुत देर तक सर्राफ का दुकान पर वैठे रह । क्या बातें हुई ? सौदागर ने अभी कुछ जवाब न दिया था कि पीछे से पण्डित और उनके दोनों खितमतगार भी आ पहुँचे । सौदागर ने पण्डित को देखते ही भर्त्सना- पूर्ण शब्दों मे कहा- मियाँ राशनुद्दौला, मुझे इस वक्त तुम्हार ऊपर इतना गुस्सा आ रहा है कि तुम्हें कुत्तों से नुचवा दूं। नमक हराम कहीं का । दगाबाज़! तूने मेरी सल्तनत को तबाह कर दिया । सारा शहर तेरे जुल्म का रोना रो रहा है ! मुझे श्राज मालूम हुआ कि तूने क्यों राजा बख्तावरसिंह को कैद कराया। मेरी अकल पर न जाने क्यों पत्थर पड़ गये थे कि मैं तेरी चिकना-चुपड़ी बातों में आ गया । इस नमकहरामी की तुझे वह सजा दूँगा कि देखनेवालों को भी इवरत ( शिक्षा ) हो। रोशनुद्दौला ने निर्भीकता से उत्तर दिया-श्राप मेरे बादशाह हैं, इसलिए आपका अदव करता हूँ, वर्ना इसी वक्त इस बद-जबानी का भजा चखा दता । -