पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/२९

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३६ मानसरोवर प्राच्य और पाश्चात्य, सभी विद्वानों का एक ही मत था-यह मायावी, आत्मिक उन्नति की बाधक, परमार्थ की विरोधिनी, वृत्तियों को कुमार्ग की ओर ले जाने- वाली, हृदय को सकीर्ण बनानेवाली होती है। इन्हीं कारणों से उन्होने इस मायावी जाति से अलग रहना हो श्रेयस्कर समझा था, किन्तु अब अनुभव बतला रहा था कि स्त्रियाँ सन्मार्ग की ओर भी ले जा सकती हैं, उनमें सद्गुण भी हो सकते हैं। वह कर्त्तव्य और सेवा के भावों को जागृत भी कर सकती हैं। तब उनके मन में प्रश्न उठता कि यदि आनन्दी से मेरा विवाह होता तो मुझे क्या आपत्ति हो सकती थी। उसके साथ तो मेरा जीवन बड़े श्रानन्द से कट जाता । एक दिन वह आनन्दी के यहाँ गये तो सिर में दर्द हो रहा था। कुछ लिखने की इच्छा न हुई । आनन्दी को इसका कारण मालूम हुआ तो उसने उनके सिर में धीरे धीरे तेल मलना शुरू किया । गोपीनाथ को उस समय अलौकिक सुख मिल रहा था। मन में प्रेम की तरंगें उठ रही थी-नेत्र, मुख, वाणी- सभी प्रेम में पगे जाते थे। उसी दिन से उन्होंने अानन्दी के यहाँ आना छोड़ दिया। एक सप्ताह बीत गया और न पाये ! आनन्दी ने लिखा- आपसे पाठशाला सम्बन्धी कई विषयों में राय लेनी है । अवश्य आइए । तब भी न गये । उसने फिर लिखा- मालूम होता है आप मुझसे नाराज हैं। मैंने जान बूझकर तो कोई ऐसा काम नहीं किया, लेकिन यदि वास्तव में आप नाराज हैं तो मैं यहाँ रहना उचित नहीं समझती। अगर आप अब भी न आयेंगे तो मैं द्वितीय अध्यापिका को चार्ज देकर चली जाऊँगी। गोपीनाथ पर इस धमकी का भी कुछ असर न हुआ। अब भी न गये । अन्त में दो महीने तक खिंचे रहने के बाद उन्हें ज्ञात हुआ कि अानन्दी बीमार है और दो दिन से पाठशाला नहीं आ सकी। तब वह किसी तर्क या युक्ति से अपने को न रोक सके । पाठशाला में आये और कुछ झिझक्ते, कुछ सकुचाते, अानन्दी के कमरे में कदम रखा । देखा तो चुप-चाप पड़ी हुई थी। मुख पीला था, घुल गया था। उसने उनकी ओर दयापार्थी नेत्रो देखा। उठना चाहा पर अशक्ति ने उठने न दिया। गोपीनाथ ने श्रार्द्र कठ से कहा- 'लेटी रहो, लेटी रहो, उठने की ज़रूरत नहीं, मैं बैठ जाता हूँ। डाक्टर साहब श्राये थे ? मिश्राइन ने कहा-जी हाँ, दो बार आये थे। दवा दे गये हैं। -