पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/४३

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५० मानसरोवर सारन्धा-आपको मदद करनी होगी। चम्पतराय -उनकी मदद करना दाराशिकोह से बैर लेना है । सारन्धा-यह सत्य है , परन्तु हाथ फैलाने की मर्यादा भी तो निभानी चाहिए! चम्पतराय-प्रिये, तुमने सोचकर जवाब नहीं दिया । सारन्धा-प्राणनाथ, मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि यह मार्ग कठिन है । और अब हमें अपने योद्धाओं का रक्त पानी के समान बहाना पड़ेगा , परन्तु हम अपना रक्त बहायेंगे और चम्बल की लहरों को लाल कर देंगे। विश्वास रखिए कि जब तक नदी की धारा बहती रहेगी, वह हमारे वीरों का कीर्तिमान करती रहेगी। जब तक बुदेलों का एक भी नामलेवा रहेगा, वे रक्त विन्दु उसके माथे पर केशर का तिलक बनकर चमकेंगे। वायुमण्डल में मेघराज की सेनाएँ उमड़ रही थीं। ओरछे के किले से बुदेलो की एक काली घटा उठी और वेग के साथ चम्बल की तरफ़ चली। प्रत्येक सिपाही वीर-रस से झूम रहा था । सारन्धा ने दोनों राजकुमारों को गले से लगा लिया और राजा को पान का बीड़ा देकर कहा-बुदेलों की लाज अब तुम्हारे हाथ है। आज उसका एक एक श्रग मुस्कुरा रहा है और हृदय हुलसित है। बुदेलों की यह सेना देखकर शाहजादे फूले न समाये । राजा वहाँ की अंगुल-अगुल भूमि से परिचित थे। उन्होंने बुदेलों को तो एक आड़ में छिपा दिया और वे शाहजादों की फौज को सजाकर नदी के किनारे-किनारे पच्छिम की ओर चले । दाराशिकोह को भ्रम हुआ कि शत्रु किसी अन्य घाट से नदी उतरना चाहता है। उन्होंने घाट पर से मोर्चे हटा लिये। घाट में बैठे हुए बुदेले उसी ताक में थे। बाहर निकल पड़े और उन्होंने तुरंत ही नदी में घोड़े डाल दिये। चम्पतराय ने शाहजादा दाराशिकोह को भुलावा देकर अपनी फौज घुमा दी। और वह बुंदेलों के पीछे चलता हुआ उसे पार उतार लाया । इस कठिन चाल में सात घण्टों का विलम्ब हुआ , परन्तु जाकर देखा तो सात सौ बुदेलों की लाणे तड़प रही थीं। राजा को देखते ही वुदेलों की हिम्मत बंध गयी। शाहजादों की सेना ने