पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/४४

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राना सारन्धा भी 'अल्लाहो अकबर' को ध्वनि के साथ धावा किया। बादशाही सेना में इलचल पड़ गई । उनकी पंक्तियों छिन्न-भिन्न हो गयी, हाथोंहाथ लड़ाई होने लगी, यहाँ तक की शाम हो गई । रणभूमि रुधिर से लाल हो गई और आकाश अँधेरा हो गया। घमासान की मार हो रही थी। बादशाही सेना शाहज़ादों को दबाये आती थी। अकस्मात् पच्छिम से फिर बुंदेलों की एक लहर उठी और इस वेग से बादशाही सेना की पुश्त पर टकराई कि उसके कदम उखड़ गये । जीता हुश्रा मैदान हाथ से निकल गया। लोगों को कुतूहल था कि यह दैवी सहायता कहाँ से आयी। सरल स्वभाव के लोगों की धारणा थी कि यह फतह के फरिश्ते हैं, शाहजादों की मदद के लिए आये हैं ; परन्तु जब राजा चम्पतराय निकट गये तो सारन्धा ने घोड़े मे उतरकर उनके पैरों पर सिर झुका दिया । राजा को असीम आनन्द हुआ। यह सारन्धा थी। समर-भूमि का दृश्य इस समय अत्यन्त दुःखमय था। थोड़ी देर पहले जहाँ सजे हुए वीरों के दल थे, वहाँ अब वेजान लाशें तड़प रही थीं। मनुष्य ने अपने स्वार्थ के लिए अनादि काल से ही भाइयों की हत्या की है। अब विजयी सेना लूट पर टूटी । पहले मर्द मदों से लड़ते थे। वह वीरता श्रीर पराकम का चित्र था, यह नीचता अोर दुर्बलता की ग्लानिप्रद तसवीर थी। उस समय मनुष्य पशु बना हुआ था, अब वह पशु से भी बढ़ गया था। इस नोच खसेट में लोगों को बादशाही सेना के सेनापति वली बहादुर खों की लाश दिखाई दी। उसके निकट उसका घाड़ा खड़ा हुआ अपनी दुम से मक्खियाँ उड़ा रहा था। राजा का घोड़े का शो कथा। देखते ही वह उस पर मोहित हो गया । यह एराको जाति का अति सुन्दर घोड़ा या। एक-एक श्रंग साँचे मे ढला हुआ, सिंह की-सो छाती ; चीते की सी कमर, उसका यह प्रेम और स्वामि-भक्ति देखकर लोगो को बढ़ा कुतूहल हुया । राजा ने हुक्म दिया -खबरदार! इस प्रेमी पर काई हथियार न चलाये, इते जीता पकड़ लो, यह मेरे श्रताल को शोभा बढ़ायेगा । जो इसे मेरे पास लायेगा, उसे धन से निहाल कर दूंगा। योद्धागण चारों ओर से लरके , परन्तु किस को साहस न होता था कि उसके निकट जा सके। कोई चुमकारता था, काई फन्दे में फंसाने के फिक्र में