पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/४७

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६० मानसरोवर हाथ ८ एक दल आता हुआ दिखाई दिया | उसका माथा ठनका कि अब कुशल नहीं है। यह लोग अवश्य हमारे शत्रु हैं। फिर विचार हुआ कि शायद मेरे राजकुमार अपने आदमियों को लिए हमारी सहायता को श्रा रहे हैं । नैराश्य में भी आशा साथ नहीं छोड़ती। कई मिनट तक वह इसी अाशा और भय की अवस्था में रही । यहाँ तक कि वह दल निकट श्रा गया और सिपाहियों के वस्त्र साफ़ नजर आने लगे। रानी ने एक ठण्डी सौंस ली, उसका शरीर तृणवत् काँपने लगा । यह बादशाही सेना के लोग थे । सारन्धा ने कहारों से कहा-डोली रोक लो । बुदेला सिपाहियों ने भी तलवारें खींच लीं । राजा की अवस्था बहुत शोचनीय थी , किन्तु जैसे दबी हुई श्राग हवा लगते ही प्रदीप्त हो जाती है, उसी प्रकार इस सकट का ज्ञान होते ही उनके जर्जर शरीर में वीरात्मा चमक उठी। वे पालकी का पर्दा उठाकर बाहर निकल आये । धनुष-वाण हाथ में ले लिया , किन्तु वह धनुष जो उनके में इन्द्र का वज्र बन जाता था, इस समय जरा भी न सुका । सिर में चक्कर श्राया, पैर थर्राये और वे धरती पर गिर पड़े। भावी श्रमगल की सूचना मिल गयी । उस पंखरहित पक्षी के सदृश, जो साँप को अपनी तरफ़ आते देख- कर ऊपर को उचकता और फिर गिर पड़ता है, राजा चम्पतराय फिर सँभलकर उठे और फिर गिर पड़े। सारन्धा ने उन्हें संभालकर बैठाया, आर रोकर बोलने की चेष्टा की , परन्तु मुँह से केवल इतना निकला-प्राणनाथ ! इसके आगे मुँह से एक शब्द भी न निकल सका । पान पर मरनेवाली सारन्धा इस समय साधारण स्त्रिया की भाति शक्तिहीन हो गई , लेकिन एक अश तक यह निर्बलता स्त्री-जाति की शोभा है। चम्पतराय बोले-“सारन, देखो, हमारा एक और वीर जमीन पर गिरा । शोक ! जिस आपत्ति से यावज्जीवन डरता रहा, उसने इस अन्तिम समय में या घेरा । मेरी आँखों के सामने शत्रु तुम्हारे कोमल शरीर में हाथ लगायेंगे, और मैं जगह से हिल भी न सकूँगा । हाय मृत्यु, कब आयगी!, यह कहते कहते उन्हें एक विचार आया । तलवार की तरफ़ हाथ बढ़ाया, मगर इथों में दम न था । तब सारन्धा से बोले-प्रिये, तुमने कितने ही अवसरों पर मेरी आन निभाई है। . !