पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/५२

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शाप । "मैं काश्मीर देश की रहनेवाली गजकन्या हूँ। मेरा विवाह एक राजपत योहा से हुआ था। उनका नाम नृसिंहदेव था । हम दोनों बड़े आनन्द से जीवन व्यतीत करते थे । नसार मा सर्वोत्तम पदार्थ रूप है, दूसरा स्वास्थ्य बोर तीसरा धन । परमात्मा ने हमको ये तीनों ली पदार्थ प्रचुर परिमाण में प्रदान किये थे । खेद है कि मैं उनसे मुलाकात नहीं करा सकती। ऐसा जाहसी, ऐसा मुन्दर, ऐसा विद्वान् पुरुप सारे काश्मीर में न या । मै उनकी आराधना करती थी। उनका मेरे ऊपर अरार स्नेह था। कई वर्षों तक हमारा जीवन एक जललोत की भाति वृक्ष-पुञ्जों और हरे हरे मैदानों में प्रवाहित होता रहा। मेरे पड़ोस में एक मन्दिर था। पुजारो एक पण्डित श्रीवर थे। हम दोनों प्रातःकाल तथा सन्ध्या नाय उस मन्दिर में उपासना के लिए जाते । मेरे स्वामी कृष्ण के भक्त थे । मन्दिर एक सुरम्य सागर के तट पर बना हुया था । वहों की परिष्कृत मन्द समीर चित्त को पुलकित कर देती थी। इसलिए हम उपासना के पश्चात् भी यहाँ घंटों वायु-सेवन करते रहते थे। श्रीधर बड़े विद्वान्, वेदों के शाता, शास्त्रों के जाननेवाले थे । कृष्ण पर उनकी भी अविचल भक्ति थी। समस्त काश्मीर मे उनके पाण्डित्य को चर्चा थी। वह बढे संयमी, सन्तोपो, आत्मज्ञानी पुरुष थे। उनके नेत्रों से शान्ति की ज्योतिरेवाएँ निकलती हुई मालूम होती थीं ; सदेव परोपकार में मग्न रहते थे। उनकी वाणी ने कभी किसी का हृदय नहों दुपाया । उनका हृदय नित्य परवेदना से पीड़ित रहता था। पण्डित श्रीधर मेरे पतिदेव से लगभग दस वर्ष बड़े थे, पर उनकी धर्मपत्नी विद्याधरी मेरी समवयका यो। हम दोनों तहेलियां थीं। विद्याधरी अत्यन्त गभीर, शान प्रकृति को ली थी । यद्यान रग रूप में वह रानी थी, पर वह अपनी से सन्तुष्ट थी। अपने पति को वद देवतुत नमझती थीं। श्रावण का महीना था। याकाश पर काले-काले पाद मँडरा रहे थे, मानों काजल के पर्वत उड़े जा रहे हैं। झग्नों से दूध का धार निकल रही या, ओर चारों ओर हरियाली छाई हुई थी। नन्हीं नन्दों फुहारें पड़ रही थीं, मानों स्वर्ग से अन्त की बूंदे टपक रही है। जल की बूंदे फूल और पतियों के गले में चमक रही थीं। चित्त का यभिलाषाओं से उभारनेवाला समा छाया हुआ अवस्था