पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/५१

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मानसरोवर भय को दबाये उसका सिर अपनी जाँघ पर रख उसे थपकियों देने लगी। सिंह पूँछ हिलाता था और सुन्दरी की अरुणवर हथेलियों को चाटता था। थोड़ी देर के बाद दोनों एक गुफा में अन्तर्हित हो गये । मुझे भी धुन सवार हुई कि किसी प्रकार इस तिलिस्म को खोलू, इस रहस्य का उद्घाटन करूँ। जब दोनों अदृश्य हो गये तो मैं भी उठा और दबे पाँव उस गुफा के द्वार तक जा पहुँचा | भय से मेरे शरीर की बोटी बोटी कॉप रही थी, मगर इस रहस्यपट को खोलने की उत्सुकता थी। मैंने गुफा के भीतर झाँका तो क्या देखता हूँ कि पृथ्वी पर जरी का पर्श बिछा हुआ है और कारचोबी गावतकिये लगे हुए हैं । सिंह मसनद पर गर्व से बैठा हुआ है । सोने-चाँदी के पात्र, सुन्दर चित्र, फूलों के गमले सभी अपने-अपने स्थान पर सजे हुए हैं, और वह गुफा राजभवन को भी लबित कर रही है। द्वार पर मेरी परछाई देखकर वह सुन्दरी बाहर निकल पायी और मुझसे कहा-“यात्री तू कौन है और इधर क्योंकर श्रा निकला" कितनी मनोहर ध्वनि थी। मैंने अबकी बार समीप से देखा तो सुन्दरी का मुख कुम्हलाया हुआ था । उसके नेत्रों से निराशा झलक रही थी, उसके त्वर में भी करुणा और व्यथा की खटक थी। मैंने उत्तर दिया-"देवी, मैं यूरोप का निवासी हूँ, यहाँ देशाटन करने आया हूँ। मेरा परम सौभाग्य है कि आपसे सम्भाषण करने का गौरव प्राप्त हुआ ।" सुन्दरी के गुलाब-से श्रोठों पर मधुर मुसकान की झलक दिखायी दी, उसमें कुछ कुटिल हात्य का भी अश था । कदाचित् यह मेरे इस अस्वाभाविक वाक्य प्रणाली का द्योतक था। "तू विदेश से यहाँ आया है । आतिथ्य-सत्कार हमारा कर्त्तव्य है। मैं आज तेरा निमन्त्रण करती हैं, स्वीकार कर ।" मैंने अवसर देखकर उत्तर दिया-"आपकी यह कृपा मेरे लिए गौरव की वात है , पर इस रहस्य ने मेरी भूख-प्यास बन्द कर दी है। क्या मैं करूँ कि आप इस पर कुछ प्रकाश डालेंगी ? सुन्दरी ने ठंडी साँस लेकर कहा-“मेरो रामकहानी विपत्ति की एक बड़ी फया है, तुझे सुनकर दुःख होगा।" किन्तु मैंने जब बहुत आग्रह किया तो उसने मुझे फर्श पर बैठने का सकेत किया और अपना वृत्तांत सुनाने लगी-- आशा