पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/८

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        यह मेरी मातृभूमि है       ६

कहने लगा कि "आगे जाओ, यहाँ जगह नहीं है ।" मैं आगे गया और वहाँ से भी यही उत्तर मिला कि "आगे जाओ।" पाँचवीं बार एक सज्जन से स्थान माँगने पर उन्होंने एक मुट्ठी चने मेरे हाथ पर रख दिये। चने मेरे हाथ से छूट पढ़े और नेत्रों से अविरल अश्रु-धारा बहने लगी। मुख से सहसा निकल पड़ा कि "हाय ! यह मेरा देश नहीं है ; यह कोई और देश है । यह हमारा अतिथि-सत्कारकारी प्यारा भारत नहीं है-कदापि नहीं है।"

मैंने एक सिगरेट की डिबिया खरीदी और एक सुनसान जगह पर बैठकर सिगरेट पीते हुए पूर्व समय की याद करने लगा कि अचानक मुझे धर्मशाला का स्मरण हो आया , जो मेरे विदेश जाते समय बन रही थी। मैं उस ओर लपका कि रात किसी प्रकार वहीं काट लूँ ; मगर शोक ! शोक !! महान् शोक !!! धर्मशाला ज्यों-की-त्यों खड़ी थी, किंतु उसमें गरीब यात्रियों के टिकने के लिए स्थान न था। मदिरा, दुराचार और द्यूत ने उसे अपना घर बना रखा था। यह दशा देखकर विवशतः मेरे हृदय से एक सर्द आह निकल पड़ी और मैं ज़ोर से चिल्ला उठा कि नहीं, नहीं, नहीं और हज़ार बार नहीं है यह मेरा प्यारा भारत नहीं है । यह कोई और देश है । यह योरोप है, अमेरिका है; मगर भारत कदापि नहीं है।

           ( ४ )

अँधेरी रात थी । गीदड़ और कुत्ते अपने-अपने कर्कश स्वर में उच्चारण कर रहे थे। मैं अपना दुःखित हृदय लेकर उसी नाले के किनारे जाकर बैठ गया और सोचने लगा-अब क्या करूँ ? क्या फिर अपने पुत्रों के पास लौट जाऊँ और अपना यह शरीर अमेरिका की मिट्टी में मिलाऊँ। अब तक मेरी मातृभूमि थी। मैं विदेश में ज़रूर था, किन्तु मुझे अपने प्यारे देश की याद बनी थी; पर अब मैं देश-विहीन हूँ। मेरा कोई देश नहीं है। इसी सोच-विचार में मैं बहुत देर तक घुटनों पर सिर रखे मौन रहा। रात्रि नेत्रों में ही व्यतीत की । घटेवाले ने तीन बजाये और किसी के गाने का शब्द कानों में आया। हृदय गद्गद् हो गया कि यह तो देश का ही राग है, यह तो मातृभूमि का ही स्वर है । मैं तुरन्त उठ खड़ा हुआ और क्या देखता हूँ कि १५-२० वृद्धा स्त्रियाँ,