पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/९५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


मानसरोवर ११२ A विचार वायु और बिजली की व्यग्रता के साथ उसके मस्तिष्क में दौड़े। वह तीव्र स्वर से वाली-भीतर मत आओ। राजकुमार ने पूछा-मुझे पहचाना नहीं ? प्रमा- खूब पहिचान लिया, किन्तु यह बातें करने का समय नहीं है । राणा तुम्हारी घात में हैं। अभी यहाँ से चले जाओ। राजकुमार ने एक पग और आगे बढ़ाया और निर्भीकता से कहा-प्रभा, तुम मुझसे निष्ठुरता करती हो । प्रभा ने धमकाकर कहा- तुम यहाँ ठहरोगे तो मैं शोर मचा दूंगी । राजकुमार ने उद्दण्डता से उत्तर दिया-इसका मुझे भय नहीं । मैं अपनी जान हथेली पर रखकर आया हूँ। आज दोनों में से एक का अन्त हो जायगा। या तो राणा रहेंगे या मैं रहूँगा, तुम मेरे साथ चलोगी ? प्रभा ने दृढ़ता से कहा-नहीं। राजकुमार व्यग्यमाव से बोला-क्यों, क्या चित्तौड़ का जलवायु पसन्द आ गया १ प्रभा ने राजकुमार की ओर तिरस्कृत नेत्रों से देखकर कहा-संसार में अपनी सब श्राशाएँ पूरी नहीं होती । जिस तरह यहाँ मैं अपना जीवन काट रही हूँ, वह मैं ही जानती हूँ , किन्तु लोक निन्दा भी तो कोई चीज है ! संसार की दृष्टि में चित्तौड़ की रानी हो चुकी । अब राणा जिस भाति रखें उसी भाँति रहूंगी। मैं अन्त समय तक उनसे घृणा करूँगी, जलूंगी, कुहूँगी। जब जलन न सही जायगी, तो विष खा लूँगी या छाती में कटार मारकर मर जाऊँगी लेकिन इसी भवन में । इस घर के बाहर कदापि पैर न रदूंगी। राजकुमार के मन में सन्देह हुआ कि प्रभा पर राणा का वशीकरण मन्त्र चल गया। यह मुझसे छल कर रही है। प्रेम की जगह ईर्ष्या पैदा हुई । वह उसी भाव से बोला-और यदि मैं यहाँ से उठा ले जाऊँ ? प्रमा के तीवर बदल गये। बोली- मैं तो वही करूंगी जो ऐसी अवस्था में क्षत्राणियों किया करती हैं। अपने गले में छुरी मार लूँगी, या तुम्हारे गले में । राजकुमार एक पग और आगे बढ़कर यह कटु-वाक्य बोला-राणा के साय तो तुम खुशी से चली आयीं । उस समय यह छुरी कहाँ गयी थी ? . 1