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मानसरोवर


तोड़कर हो चुके हैं। अगर विवाह का उद्देश्य स्त्रो और पुरुष का सुखमय जीवन है, तो हम प्रेम को उपेक्षा नहीं कर सकते।

वृद्धा ने क्षुब्ध होकर कहा --- जब तुम्हारी यही इच्छा है, तो मुझसे क्या पूछते हो ? लेकिन मैं कहे देती हूँ कि मैं इस विवाह के नजदीक न जाऊँगो, न कभी इस छोकरी का मुंँह देखू मी, समझ लूंगी, जैसे और सब लड़के मर गये, वैसे यह भी मर गई।

'तो फिर आखिर तुम क्या करने कहती हो ?'

'क्यों नहीं उस लड़के से विवाह कर देते, उसमें क्या बुराई है ? वह दो साल में सिविल सरविस पास करके आ जायगा। देशव के पास क्या रखा है, बहुत होगा, किसी दफ्तर में क्लर्क हो जायगा।'

'और अगर प्रेमा प्राण-हत्या कर ले, तो ?'

'तो कर ले, तुम तो उसे और शह देते हो। जब उसे हमारी परवाह नहीं है, तो हम उसके लिए अपने नाम को क्यों कलंकित करें ? प्लाण हत्या करना कोई खेल नहीं है। यह सब धमकी है। मन घोड़ा है, जब तक उसे लगाम न दो, पुढे पर हाथ भी न रखने देगा। जम उसके मन का यह हाल है, तो कौन कहे, वर केशव के साथ ही जिन्दगी भर निमाह बरेगी। जिस तरह आज उससे प्रेम है, उसी तरह कल दूसरे से हो सकता है। तो क्या पत्ते पर अपना मांस बिश्वाना चाहते हो ?'

लालाजी मे स्त्री को प्रश्न-सूचक दृष्टि से देखकर कहा-और अगर वह कल खुद जाकर केशव से विवाह कर ले, तो तुम क्या कर लोगी ? फिर तुम्हारी कितनी इज्जत रह जायगी। चाहे वह संकोच वश, या हम लोगों के लिहाज से, योही बैठी रहे ; पर यदि जिद्द पर कमर बांध ले, तो हम तुम कुछ नहीं कर सकते।

इस समस्या का ऐसा भीषण अन्त भी हो सकता है, यह इस वृद्धा के ध्यान में भी न आया था। यह प्रश्न बमगोले की तरह उसके मस्तक पर गिरा। एक क्षण तक वह अवाक् बैठी रह गई, मानों इस आघात ने उसको बुद्धि की धज्जियां उड़ा दी हो। फिर पराभूत होकर बोली --- तुम्हें.अनोखी ही कल्पनाएँ सूझती हैं ! मैंने तो आज तक कभी भी नहीं सुना कि किसी कुलीन कन्या ने अपनी इच्छा से विवाह किया है।

'तुमने न सुना हो ; लेकिन मैंने सुना है, और देखा है, और ऐसा होना बहुत सम्भव है।'