पृष्ठ:मेघदूत का हिन्दी-गद्य में भावार्थ-बोधक अनुवाद.djvu/१८

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मेघदूत।


लगती। मुझ पर दया कर। मैं सचमुच ही दया का पात्र हूँ। दुदैंव ने मुझे यहाँ घर से बहुत दृर लाकर डाला है। मेरी चिर- सङ्गिनी यक्षिणी मुझसे छूट गई है। मेरे दुःख की सीमा नहीं। और दुखिया का दुःख दूर करना सज्जनों का काम ही है। इसी से मैं तुझमें एक याचना करना चाहता हूँ। भले आदमियाँ से की गई याचना यदि न भी सफल हो तो भी अच्छी है, पर नीचों से की गई याचना यदि सफल भी हो जाय तो भी अच्छा नहीं। नीचात्मा जनों से कभी याचना ही न करना चाहिए। तू उच्चात्मा है--तू सदा ऊँचा रहता है---इसी से सङ्कोच छोड़ कर मुझे तुझसे एक प्रार्थना करनी है। तू सन्तप्तों का ताप दूर करने वाला है। ताप से तप हुए प्राणी सदा तेरी ही शरण जाते हैं। अतएव, आशा है मरी प्रार्थना का स्वीकार करके, कुवेर के शाप से सन्तप्त हुए मुझ दुखिया की भी तू अवश्य ही सहायता करेगा।

भाई! मेरा सन्देश मेरी प्रियतमा पत्नी के पास अलकापुरी में पहुँचा दे। यह नगरी ऐसी वैसी नहीं; बड़ी सुन्दर है। बड़े बड़े यक्षराज वहाँ रहते हैं। उसके बाहरी बागीचों में प्रत्यक्ष शिवजी ठहरा करते हैं। उनकी स्थिति के समय उनके मस्तकवर्ती चन्द्रमा की चाँदनी से अलका के महल खूबही चमचमाते हैं। अतएव, यदि तु, मेरी प्रार्थना मान लेगा तो एक पन्थ दो काज की लोकोक्ति चरितार्थ हो जायगी। इधर तो मेरा काम हो जायगा। उधर तुझे भी एक बड़ीही शोभाशालिनी नगरी देखने को मिल जायगी।

आकाश में जिस राह से पवन प्रयाण करता है उसी राह से तुझे जाता देख विदेशवासियों की वनिगायें अपनी आँखें तेरी