पृष्ठ:मेघदूत का हिन्दी-गद्य में भावार्थ-बोधक अनुवाद.djvu/५३

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मेघदूत ।

में वह अतिशय चोए हो रही है: मेरा वियोग उमे इतना मना रहा है कि हज़ार चेष्टा करने पर भी उसे नींद नहीं मानी:वह तुझे अँधेरे पाख की चतुदशी के चन्द्रमा को पर्ची हाक-मात्र कन्दा के समान दुबनी मानुन होगी मरे मात्र रहने समय जो रात पलक मारने बीन जाती थी उमी का अब वह वियोग-जन्य उ अाँसू बहाती हुई बड़ी कठिनता में काटती होगी । बार बार गग्म उमाम लते लेने उसकं नवल-पल्लब-नुल्य कोमल अवर सूख गये होगे विनातल-उबटन लगाय ही स्नान करने के कारण उम केगों की बुरी दशा होगी। वे वं हां गयं नं ! उनको लटें उमकं कपोलों पर लटक रही होगी। जब वह लम्बी उमासे लती होगी तब मुस्त्र पर पड़ी हुई उनकी अलके हिल हिल कर इधर-उधर बिखर ज्ञानी होगी । वह बहुत चाहती होगी कि यदि क्षण भर भी नीद आ जाय तो माक्षान् न सही. स्वप्न ही में, मुझसे उसका मिलाप हो जाय: परन्तु आँग्वां से बहनेवाले प्रांसुओं की धारा पल भर भी उसकी पलकें न लगने देती होगी।

मैं उसकी दयनीय दशा का अहाँ नक वर्णन क । जिम दिन मैं उससे बिछुड़ा उन दिन उनकी वेगो विना माला ही के बाधी गई थी : शाप की अवधि बीत जाने पर, जब मैं मुदिन-मन घर लौटुंगा तब उसे में ही अपने हाथ से खालूंगा ' तब तक वह वैसी ही पड़ी रहेगी। इस कारण वह अत्यन्त कठिन हो गई होगी-इतनी कठिन कि उसके स्पर्श से मंरी प्रिया के कपाना को बहुत कष्ट होता होगा । उसे वह बद हुप नखोवाले अपने हाथ से बार बार सरकाती होगी।