पृष्ठ:रंगभूमि.djvu/१५१

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रंगभूमि

जॉन सेवक— "फीस बिलकुल ही न ली जायगी, कम-ज्यादा कैसी!"

जगधर—"तब तो बड़ा आराम हो जायगा।"

नायकराम—"जिसका माल है, उसे क्या मिलेगा?"

जॉन सेवक—"जो तुम लोग तय कर दो। मैं तुम्हीं को पंच मानता हूँ। बस, उसे राजी करना तुम्हारा काम है।”

नायकराम—"वह राजी ही है। आपने बात-की-बात में सबको राजी कर लिया, नहीं तो यहाँ लोग मन में न जाने क्या क्या समझे बैठे थे। सच है, विद्या बड़ी चीज है।"

भैरो—“वहाँ ताड़ी की दूकान के लिए कुछ देना तो न पड़ेगा?"

नायकराम—"कोई और खड़ा हो गया, तो चढ़ा-ऊपरी होगी ही।"

जॉन सेवक—"नहीं, तुम्हारा हक सबसे बढ़कर समझा जायगा।"

नायकराम—"तो फिर तुहारी चाँदी है भैरो!"

जॉन सेवक—"तो अब मैं चलूँ पंडाजी, अब आपके दिल में मलाल तो नहीं है?"

नायकराम—"अब कुछ कहलाइए न, आपका-सा भलामानुस आदमी कम देखा।" जॉन सेवक चले गये, तो बजरंगी ने कहा-"कहीं सूरे राजी न हुए, तो?”

नायकराम—"हम तो राजी करेंगे! चार हजार रुपये दिलाने चाहिए। अब इसी समझौते में कुसल है। जमीन रह नहीं सकती। यह आदमी इतना चतुर है कि इससे हम लोग पेस नहीं पा सकते। यो निकल जायगी तो हमारे साथ यह सलूक कौन करेगा? सेंत में जस मिलता हो, तो छोडना न चाहिए।"

जॉन सेवक घर पहुंचे, तो डिनर तैयार था। प्रभु सेवक ने पूछा--"आप कहाँ गये थे?” जॉन सेवक ने रूमाल से मुँह पोंछते हुए कहा-"हरएक काम करने का तमीज चाहिए। कविता रच लेना दूसरी बात है, काम कर दिखाना दूसरी बात। तुम एक काम करने गये, मोहल्ले-भर से लड़ाई ठानकर चले आये। जिस समय मैं पहुँचा हूँ, सारे आदमी नायकराम के द्वार पर जमा थे। वह डोली में बैठकर शायद राजा महेंद्रसिंह के पास जाने को तैयार था। मुझे सबों ने यों देखा, जैसे फाड़ खायेंगे। लेकिन मैंने कुछ इस तरह धैर्य और विनय से काम लिया, उन्हें दलीलों और चिकनी-चुपड़ी बातों से ऐसा ढरें पर लाया कि जब चला, तो सब मेरा गुणानुवाद कर रहे थे। जमीन का मुआमला भी तय हो गया। उसके मिलने में अब कोई बाधा नहीं है।"

प्रभु सेवक—“पहले तो सब उस जमीन के लिए मरने-मारने पर तैयार थे।"

जॉन सेवक—"और कुछ कसर थी, तो वह तुमने जाकर पूरी कर दी। लेकिन याद रखो, ऐसे विषयों में सदैव मार्मिक अवसर पर निगाह रखनी चाहिए। यही सफलता का मूल-मंत्र है। शिकारी जानता है, किस वक्त हिरन पर निशाना मारना चाहिए। वकील जानता है, अदालत पर कब उसकी युक्तियों का सबसे अधिक प्रभाव पड़ सकता है। एक महीना नहीं, एक दिन पहले, मेरी बातों का इन आदमियों पर जरा भी असर न होता। कल तुम्हारी उइंडता ने वह अवसर प्रस्तुत कर दिया। मैं क्षमा-प्रार्थी बनकर उनके सामने