पृष्ठ:रंगभूमि.djvu/१७८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
१८०
रंगभूमि


में नहीं आता कि साम्यदेव के पुजारी बनकर वह किस मुँह से विशाल प्रामादों में रहते हैं, मोटर-बोटों में जलक्रीड़ा करते हैं और संसार के सुखों का दिल खोलकर उपभोग करते हैं। अपने कमरे से फर्श हटा देना और सादे वस्त्र पहन लेना ही साम्यवाद नहीं है। यह निर्लज धूर्तता है, खुला हुआ पाखंड है। अपनी भोजनशाला के बचे-खुचे टुकड़ों को गरीबों के सामने फेंक देना साम्यवाद को मुंँह चिढ़ाना, उसे बदनाम करना है।"

यह कटाक्ष कुँवर साहब पर था। इंदु समझ गई। त्योरियाँ बदल गई; किंतु उसने जब्त किया और इस अप्रिय प्रसंग को समाप्त करने के लिए बोली- "मुझे देर हो रही है, तीन बजनेवाले हैं, साढ़े तीन पर गाड़ी छूटती है, अम्माँजी से मुलाकात हो जायगी, विनय का कुशल-समाचार भी मिल जायगा। एक पंथ दो काज होगा।"

राजा साहब-"जिन कारणों से मेरा जाना अनुचित है, उन्हीं कारणों से तुम्हारा जाना भी अनुचित है। तुम जाओ या मैं जाऊँ, एक ही बात है।"

इंदु उसी पाँव अपने कमरे में लौट आई और सोचने लगी-यह अन्याय नहीं, तो और क्या है? घोर अत्याचार! कहने को तो रानी हूँ, लेकिन इतना अख्तियार भी नहीं कि घर से बाहर जा सकूँ। मुझसे तो लौडियाँ ही अच्छी है। चित्त बहुत खिन्न हुआ, आँखें सजल हो गई। घंटी बजाई, और लौंडी से कहा-“गाड़ी खुलवा दे, मैं स्टेशन न जाऊँगी।"

महेंद्रकुमार भी उसके पीछे-पीछे कमरे में आकर बोले-"कहीं मैर क्यों नहीं कर आती?"

इंदु-"नहीं, बादल घिरा हुआ है, भीग जाऊँगी।"

राजा साहब-"क्या नाराज हो गई?”

इंदु-"नाराज क्यों हूँ। आपके हुक्म की लौंडी हूँ। आपने कहा, मत जाओ, न जाऊँगी।"

राजा साहब-"मैं तुम्हें विवश नहीं करना चाहता। यदि मेरी शंकाओं को जान लेने के बाद भी तुम्हें वहाँ जाने में कोई आपत्ति नहीं दिखलाई पड़ती, तो शौक से जाओ। मेरा उद्देश्य केवल तुम्हारी सद्बुद्धि को प्रेरित करना था। मैं न्याय के बल से रोकना चाहता हूँ, आज्ञा के बल से नहीं। बोलो, अगर तुम्हारे जाने में मेरी बदनामी हो, तो तुम जाना चाहोगी?"

यह चिड़िया के पर काटकर उसे उड़ाना था। इंदु ने उड़ने की चेष्टा ही न की। इस प्रश्न का केवल एक ही उत्तर हो सकता था-"कदापि नहीं, यह मेरे धर्म के प्रतिकल है।” किंतु इंदु को अपनी परवशता इतनी अग्बर रही थी कि उमने इस प्रश्न को सुना ही नहीं, या सुना भी, तो उस पर ध्यान न दिया। उसे ऐमा जान पड़ा, यह मेरे जले पर नमक छिड़क रहे हैं। अम्माँ अपने मन में क्या कहेंगी? मैंने बुलाया, और नहीं आई! क्या दौलत की हवा लगी? कैसे क्षमा याचना करूँ? यदि लिखू, अस्वस्थ हूँ, तो वह एक क्षण में यहाँ आ पहुँचेंगी और मुझे लजित होना पड़ेगा। आह! अब तक