पृष्ठ:रंगभूमि.djvu/१८१

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रंगभूमि

इंदु—"आपकी इच्छा के विरुद्ध आई थी। आपने मेरे कारण अपने नियम का उल्लंघन किया है, तो मैं किस मुँह से वहाँ जा सकती हूँ? आपने मुझे सदा के लिए शालीनता का सबक दे दिया।”

राजा—"मैं उन लोगों से तुम्हें लाने का वादा कर आया हूँ। तुम न चलोगी, तो मुझे कितना लजित होना पड़ेगा।"

इंदु—"आप व्यर्थ इतना आग्रह कर रहे हैं। आपको मुझसे नाराज होने का यह अंतिम अवसर था। अब फिर इतना दुस्साहस न करूँगी।"

राजा—"एंजिन सीटी दे रहा है।"

इंदु—"ईश्वर के लिए मुझे जाने दीजिए।"

राजा ने निराश होकर कहा—"जैसी तुम्हारी इच्छा, मालूम होता है, हमारे और तुम्हारे ग्रहों में कोई मौलिक विरोध है, जो पग-पग पर अपना फल दिखलाता रहता है।"

यह कहकर वह मोटर पर सवार हो गये, और बड़े वेग से स्टेशन की तरफ चले। बग्धी भी आगे बढ़ी। कोचवान ने पूछा-"हुजूर, गई क्यों नहीं? सरकार बुरा मान गये।”

इंदु ने इसका कुछ जवाब न दिया। वह सोच रही थी-क्या मुझले फिर भूल हुई? क्या मेरा जाना उचित था? क्या वह शुद्ध हृदय से मेरे जाने के लिए आग्रह कर रहे थे? या एक थप्पड़ लगाकर दूसरा थप्पड़ लगाना चाहते थे? ईश्वर ही जानें। वही अंतर्यामी हैं, मैं किसी के दिल की बात क्या जानूँ!

गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ती जाती थी। आकाश पर छाये हुए बादल फटते जाते थे; पर इंदु के हृदय पर छाई हुई घटा प्रतिक्षण और भी घनी होती जाती थी-आह! क्या वस्तु तः हमारे ग्रहों में कोई मौलिक विभाग है, जो पग-पग पर मेरो आकांक्षाओं को दलित करता रहता है? मैं कितना चाहती हूँ कि उनकी इच्छा के विरुद्ध एक कदम भी न चलूँ; किंतु यह प्रकृति-विरोध मुझे हमेशा नीचा दिखाता है। अगर वह शुद्ध मन से अनुरोध कर रहे थे, तो मेरा इनकार सर्वथा असंगत था। आह! उन्हें मेरे हाथों फिर कष्ट पहुँचा । उन्होंने अपनी स्वाभाविक मजनता से मेरा अपराध क्षमा किया और मेरा मान रखने के लिए अपने सिद्धांत की परवा न की। समझे होंगे, अकेली जायगी, तो लोग खयाल करेंगे, पति की इच्छा के विरुद्ध आई है, नहीं तो क्या वह भी न आते? मुझे इस अपमान से बचाने के लिए उन्होंने अपने ऊपर इतना अत्याचार किया। मेरी जड़ता से वह कितने हताश हुए हैं, नहीं तो उनके मुँह से यह वाक्य कदापि न निकलता। मैं सचमुच अभागिनी हूँ।

इन्हीं विघादमय विचारों में डूबी हुई वह चंद्रभवन पहुँची और गाड़ी से उतरकर सीधे राजा साहब के दीवानखाने में जा बैठी। आँखे चुरा रही थी कि किसी नौकर-चाकर में सामना न हो जाय। उसे ऐसा जान पड़ता था कि मेरे मुख पर कोई दाग लगा हुआ है। जी चाहता था, रामा साहब आते-ही-आते मुझ पर बिगड़ने लगे, मुझे खूब