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रंगभूमि

राजा साहब—“मैं जानता हूँ, आप लोगों को यह किसी तरह नहीं भूल सकता कि मैं भारतवासी हूँ, इसी प्रकार मेरे बोर्ड के सहयोगियों के लिए यह भूल जाना असंभव है कि मैं शासन का एक अंग हूँ। आप जानते हैं कि मैं बोर्ड में मिस्टर जॉन सेवक को पाड़ेपुर की जमीन दिलाने का प्रस्ताव करनेवाला हूँ; लेकिन जब तक मैं अपने आचरण से यह सिद्ध न कर दूँगा कि मैंने स्वतः, बगैर किसी दबाव के, केवल प्रजा के हित के लिए, यह प्रस्ताव उपस्थित किया है, उसकी स्वीकृति को कोई आशा नहीं है। यही कारण है, जो मुझे कल स्टेशन पर ले गया था।"

कमिश्नर की बाँछे खिल गई। हँस-हँसकर बातें बनाने लगा।

राजा साहब—“ऐसी दशा में क्या आप समझते हैं, मेरा जवाब देना जरूरी है?"

कमिश्नर—"नहीं-नहीं, कभी नहीं।”

राजा साहब—"मुझे आपसे पूरी सहायता मिलनी चाहिए।"

कमिश्नर-“मैं यथाशक्ति आपकी सहायता करूँगा।"

राजा साहब—"बोर्ड ने मंजूर भी कर लिया, तो मुहल्लेबालों की तरफ से फसाद की आशंका है।"

कमिश्नर—"कुछ परवा नहीं, मैं सुपरिटेंडेंट-पुलिस को ताकीद कर दूँगा कि वह आपकी मदद करते रहें।"

राजा साहब यहाँ से चले, तो ऐसा मालूम होता था, मानों आकाश पर चल रहे हैं। यहाँ से वह मि० क्लार्क के पास गये और वहाँ भी इसी नीति से काम लिया। दोपहर को घर आये। उनके हृदय में यह खयाल खटक रहा था कि इस बहाने से मेरा काम तो निकल गया; लेकिन मैं सूरदास के साथ कहीं ऐसी ज्यादती तो नहीं कर रहा हूँ कि अंत में मुझे नगरवासियों के सामने लजित होना पड़े! इसी विषय में बातचीत करने के लिए वह इंदु के पास आये और बोले- "तुम कोई जरूरी काम तो नहीं कर रही हो? मुझे एक बात में तुमसे कुछ सलाह करनी है।"

इंदु डरी कि कहीं सलाह करते-करते वाद-विवाद न होने लगे। बोली— "काम तो कुछ नहीं कर रही हूँ; लेकिन मैं आपको कोई सलाह देने के योग्य नहीं हूँ। परमात्मा ने मुझे इतनी बुद्धि ही नहीं दी। मुझे तो उन्होंने केवल खाने, सोने और आपको दिक करने के लिए बनाया है।"

राजा साहब—"तुम्हारे दिक करने ही में तो मजा आता है। बतलाओ, सूरदास की जमीन के बारे में तुम्हारी क्या राय है? तुम मेरी जगह होतो, तो क्या करती?"

इंदु—"आखिर आपने क्या निश्चय किया?"

राजा साहब—"पहले तुम बताओ, तो फिर मैं बताऊँगा।"

इंदु—"मेरी राय में तो सूरदास से उनके बाप-दादों की जायदाद छीन लेना अन्याय होगा।"