पृष्ठ:रंगभूमि.djvu/१८४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
१८६
रंगभूमि


आँखें नीची न करनी पड़ें; पर बुद्धि कुछ काम न करती थी। कई बार इच्छा हुई कि चलकर इंदु से इस समस्या को हल करने में मदद लूँ, पर यह समझकर कि कहीं वह कह दे कि 'हुक्काम नाराज होते हैं, तो होने दो, तुम्हें उनसे क्या सरोकार; अगर वे तुम्हें दबायें, तो तुरंत त्याग-पत्र भेज दो, तो फिर मेरे लिए निकलने का कोई रास्ता न रहेगा, उससे कुछ कहने की हिम्मत न पड़ी।

वह सारी रात इसी चिंता में डूबे रहे। इंदु भी कुछ सुमगुम थी। प्रातःकाल दो-चार मित्र आ गये और उसी लेख की चर्चा की। एक साहब बोले —कमिश्नर से मिलने गया था, तो वह इसी लेख को पढ़ रहा था और रह-रहकर जमीन पर पैर पटकता था।"

राजा साहब के होश और भी उड़ गये। झट उन्हें एक उपाय सूझ गया। मोटर तैयार कराई और कमिश्नर के बँगले पर जा पहुँचे। यों तो यह महाशय राजा साहब का कार्ड पाते ही बुला लिया करते थे, आज अरदली ने कहा—“साहब एक जरूरी काम कर रहे हैं, मेम साहब बैठी हैं, आप एक घंटा ठहर।”

राजा साहब समझ गये कि लक्षण अच्छे नहीं हैं। बैठकर एक अँगरेजी पत्रिका के चित्र देखने लगे-वाह, कितने साफ और सुन्दर चित्र हैं! हमारी पत्रिकाओं में कितने भद्दे चित्र होते हैं, व्यर्थ ही कागज लीप-पोतकर खराब किया जाता है। किसी ने बहुत किया, तो बिहारीलाल के भावों को लेकर एक सुन्दरी का चित्र बनवा दिया और उसके नीचे उसी भाव का दोहा लिख दिया; किसी ने पद्माकर के कवित्त को चित्रित किया। बस, इसके आगे किसी को अक्ल नहीं दौड़ती।

किसी तरह एक घंटा गुजरा और साहब ने बुलाया। राजा साहब अंदर गये, तो साहब की त्योरियाँ चढ़ी हुई देखीं। एक घंटे के इंतजार से झुंझला गये थे, खड़े-खड़े बोले-"आपको अवकाश हो, तो मैं कुछ कहूँ, नहीं तो फिर कभी आऊँगा।"

कमिश्नर साहब ने रुखाई से पूछा—"मैं पहले आपसे यह पूछना चाहता हूँ कि इस पत्र ने आपके विषय में जो आलोचना की है, वह आपकी नजर से गुजरी है?”

राजा साहब—"जी हाँ, देख चुका हूँ।”

कमिश्नर—"आप इसका कोई जवाब देना चाहते हैं?"

राजा साहब—"मैं इसकी कोई जरूरत नहीं समझता; अगर इतनी-सी बात पर मुझ पर अविश्वास किया जा सकता है और मेरी बरसों की वफादारी का कुछ विचार नहीं किया जाता, तो मुझे विवश होकर अपना पद-त्याग करना पड़ेगा। अगर आप वहाँ जाते, तो क्या इस पत्र को इतना साहस होता कि आपके विषय में यही आलोचना करता? हरगिज नहीं। यह मेरे भारतवासी होने का दंड है। जब तक मुझ पर ऐसी द्वेष-पूर्ण टीका-टिप्पणी होती रहेगी, मैं नहीं समझ सकता कि अपने कर्तव्य का कैसे पालन कर सकूँगा।"

कमिश्नर ने कुछ नरम होकर कहा—"गवर्नमेंट के हरएक कर्मचारी का धर्म है कि किसी को अपने ऊपर ऐसे इलजाम लगाने का अवसर न दे।"