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रंगभूमि

राजा साहब-(मुस्किराकर) "बड़े मार्के की युक्ति है। कायल हो गया। मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं। लेकिन शायद मालूम नहीं कि उस अंधे को तुम जितना दीन और असहाय समझती हो, उतना नहीं है। सारा मोहल्ला उसकी हिमायत करने पर तैयार है; यहाँ तक कि लोग मि० सेवक के गुमाश्ते के घर में घुस गये, उनके भाइयों को मारा, आग लगा दी, स्त्रियों तक की बेइज्जती को।"

इंदु-"मेरे विचार में तो यह इस बात का एक और प्रमाण है कि उस जमीन को छोड़ दिया जाय। उस पर कब्जा करने से ऐसी घटनाएँ कम न होंगी, बढ़ेगी। मुझे तो भय है, कहीं खून-खराबा न हो जाय।"

राजा साहब-"जो लोग स्त्रियों की बेइज्जती कर सकते हैं, वे दया के योग्य नहीं।"

इंदु--"जिन लोगों की जमीन आप छीन लेंगे, वे आपके पाँव न सहलायेंगे।"

राजा साहब-"आश्चर्य है, तुम स्त्रियों के अपमान को मामूली बात समझ रही हो।"

इंदु-"फौज के गोरे, रेल के कर्मचारी, नित्य हमारी बहनों का अपमान करते रहते हैं, उनसे तो कोई नहीं बोलता। इसीलिए कि आप उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकते। अगर लोगों ने उपद्रव किया है, तो अपराधियों पर मुकदमा दायर कीजिए, उन्हें दंड दिलाइए। उनकी जायदाद क्यों जब्त करते हैं?"

राजा साहब-"तुम जानती हो, मि. सेवक की यहाँ के अधिकारियों से कितनी राह-रस्म है। मिरटर क्लार्क तो उनके द्वार के दरबान बने हुए हैं। अगर मैं उनकी इतनी सेवा न कर सका, तो हुक्काम का विश्वास मुझ पर से उठ जायगा।”

इंदु ने चिंतित स्वर में कहा-"मैं नहीं जानती थी कि प्रधान की दशा इतनी शोचनीय होती है!"

राजा साहब-"अब तो मालूम हो गया। बतलाओ, अब मुझे क्या करना चाहिए?"

इंदु-“पद-त्याग।"

राजा साहब-"मेरे पद-त्याग से जमीन बच सकेगी?"

इंदु-"आप दोष-पाप से तो मुक्त हो जायँगे!"

राजा साहब-"ऐसी गोण बातों के लिए पद-त्याग हास्य-जनक है।"

इंदु को अपने पति के प्रधान होने का बड़ा गर्व था। इस पद को वह बहुत श्रेष्ठ और आदरणीय समझती थी। उसका खयाल था कि यहाँ राजा साहब पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं, बोर्ड उनके अधीन है, जो चाहते हैं, करते हैं; पर अब विदित हुआ कि उसे कितना भ्रम था। उसका गर्व चूर-चूर हो गया। उसे आज ज्ञात हुआ कि प्रधान केवल राज्याधिकारियों के हाथों का खिलौना है। उनकी इच्छा से जो चाहे करे, उनको इच्छा के प्रतिकूल कुछ नहीं कर सकता। वह संख्या का विंदु है, जिसका मूल्य केवल दूसरी संख्याओं के सहयोग पर निर्भर है। राजा साहब की पद-लोलुपता उसे कुठाराघात के समान लगी। बोली-"उपहास इतना निंद्य नहीं है, जितना अन्याय। मेरी समझ में नहीं आता कि आपने इस पद की कठिनाइयों को जानते हुए भी क्यों इसे स्वीकार