पृष्ठ:रंगभूमि.djvu/१९७

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रंगभूमि


हमने आपका नाम सुना है। आज आपके दर्शन पाकर हमारा जीवन सफल हो गया। इस इलाके में आपका यश घर-घर गाया जा रहा है। मेरा लड़का घोड़े से गिर पड़ा था। पसली की हड्डी टूट गई थी। जीने की कोई आशा न थी। आप ही के साथ के एक महाराज हैं इन्द्रदत्त। उन्होंने आकर लड़के को देखा, तो तुरंत मरहम-पट्टी की और एक महीने तक रोज आकर उसकी दवा-दारू करते रहे। लड़का चंगा हो गया। मैं तो प्राण भी दे दूँ, तो आपसे उऋण नहीं हो सकता। अब हम पापियों का उद्धार कीजिए। हमें आज्ञा दीजिए कि आपके चरणों की रज माथे पर लगायें। हम तो इस योग्य भी नहीं हैं।"

विनय ने मुस्किराकर कहा-“अब तो डाकिये की जान न लोगे? तुमसे हमें डर लगता है।"

सरदार-"महाराज, हमें अब लज्जित न कीजिए। हमारा अपराध क्षमा कीजिए। डाकिया महा शय, तुम आज किसी भले आदमी का मुँह देखकर उठे थे, नहीं तो अब तक तुम्हारा प्राण-पखेरू आकाश में उड़ता होता। मेरा नाम सुना है न? वीरपालसिंह मैं ही हूँ, जिसने राज्य के नौकरों को नेस्तनाबूद करने का प्रण कर लिया है।"

विनय-राज्य के नौकरों पर इतना अत्याचार क्यों करते हो?"

वीरपाल-"महाराज, आप तो कई महीनों से इस इलाके में हैं, क्या आपको इन लोगों की करतूतें मालूम नहीं हैं? ये लोग प्रजा को दोनों हाथों से लूट रहे हैं। इनमें न दया है, न धर्म। हैं हमारे ही भाई-बंद, पर हमारी ही गरदन पर छुरी चलाते हैं। किसी ने जरा साफ कपड़े पहने, और ये लोग उसके सिर हुए। जिसे धूस न दीजिए, वही आपका दुश्मन है। चोरी कीजिए, डाके डालिए, घरों में आग लगाइए, गरीबों का गला काटिए, कोई आपसे न बोलेगा। बस, कर्मचारियों की मुट्ठियाँ गर्म करते रहिए। दिन-दहाड़े खून कीजिए, पर पुलिस की पूजा कर दीजिए, आप बेदाग छूट जायेंगे, आपके बदले कोई बेकसूर फाँसी पर लटका दिया जायगा। कोई फरियाद नहीं सुनता। कौन सुने, सभी एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। यही समझ लीजिए कि हिंसक जन्तुओं का एक गोल है, सब-के-सब मिलकर शिकार करते हैं और मिल-जुलकर खाते हैं। राजा है, वह काठ का उल्लू। उसे विलायत में जाकर विद्वानों के सामने बड़े-बड़े व्याख्यान देने की धुन है। मैंने यह किया और वह किया, बस, डींगे मारना उसका काम है। या तो विलायत की सैर करेगा, या यहाँ अँगरेजों के साथ शिकार खेलेगा, सारे दिन उन्हीं कि जूतियाँ सीधी करेगा। इसके सिवा उसे कोई काम नहीं, प्रजा जिये या मरे, उसकी बला से। बस, कुशल इसी में है कि कर्मचारी जिस कल बैठाये, उसी कल बैठिए, शिकायत न कीजिए, जबान न हिलाइए; रोइए, तो मुँह बन्द करके। हमने लाचार होकर इस हत्या-मार्ग पर पग रखा है। किसी तरह तो इन दुष्टों की आँस्ने खुलें। इन्हें मालूम हो कि हमें भी दंड देनेवाला कोई है। ये पशु से मनुष्य हो जाय।

विनय—"मुझे यहाँ की स्थिति का कुछ ज्ञान तो था; पर यह न मालूम था कि