पृष्ठ:रंगभूमि.djvu/२१२

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रंगभूमि


संध्या हो गई थी। माघ का महीना था; उस पर हवा, फिर बादल; सर्दी के मारे हाथ-पाँव अकड़े जाते थे। न कहीं आकाश का पता था, न पृथ्वी का। चारों तरफ कुहरा-ही-कुहरा नजर आता था। रविवार था। ईसाई स्त्रियाँ और पुरुष साफ-सुथरे कपड़े और मोटे-मोटे ओवरकोट पहने हुए एक-एक करके गिरजाघर में दाखिल हो रहे थे। एक क्षण में जॉन सेवक, उनकी स्त्री, प्रभु सेवक और ईश्वर सेवक फिटन से उतरे। और लोग तो तुरंत अंदर चले गये, केवल सोफिया बाहर रह गई। सहसा प्रभु सेवक ने बाहर आकर पूछा-"क्यों सोफी, मिस्टर क्लार्क अंदर गये?"

सोफिया—"हाँ, अभी-अभी गये हैं।”

प्रभु सेवक—"और तुम?"

सोफिया ने दीन भाव से कहा— "मैं भी चली जाऊँगी।"

प्रभु सेवक—"आज तुम बहुत उदास मालूम होती हो।”

सोफिया की आँखें अश्रु-पूर्ण हो गई। बोली-'हाँ प्रभु, आज मैं बहुत उदास हूँ। आज मेरे जीवन में सबसे महान् संकट का दिन है; क्योंकि आज मैं क्लार्क को प्रोपोज करने के लिए मजबूर करूँगी। मेरा नैतिक और मानसिक पतन हो गया। अब मैं अपने सिद्धांतों पर जान देनेवाली, अपने ईमान को ईश्वरीय इच्छा समझनेवाली, धर्म-तत्वों को तर्क की कसौटी पर रखनेवाली सोफिया नहीं हूँ। वह सोफिया संसार में नहीं है। अब मैं जो कुछ हूँ, वह अपने मुँह से कहते हुए मुझे स्वयं लजा आती है।"

प्रभु सेवक कवि होते हुए भी उस भावना-शक्ति से वंचित था, जो दूसरों के हृदय में पैठकर उनकी दशा का अनुभव करती है। वह कल्पना-जगत् में नित्य विचरता रहता था और ऐहिक सुख-दुःख से अपने को चिंतित बनाना उसे हास्यास्पद जान पड़ता था। ये दुनिया के झमेले हैं, इनमें क्यों सिर खपाय, मनुप्य को भोजन करना और मस्त रहना चाहिए। यही शब्द सोफिया के मुख से सैकड़ों बार सुन चुका था। झुंझला कर बोला—"तो इसमें रोने-धोने की क्या जरूरत है? अम्माँ से साफ-साफ क्यों नहीं कह देती? उन्होंने तुम्हें मजबूर तो नहीं किया है।"

सोफिया ने उसका तिरस्कार करते हुए कहा—"प्रभु, ऐसी बातों से दिल न दुखाओ। तुम क्या जानो, मेरे दिल पर क्या गुजर रही है। अपनी इच्छा से कोई विप का प्याला नहीं पीता। शायद हा कोई ऐसा दिन जाता हो कि मैं तुमसे अपनी सैकड़ों बार की कहो हुई कहानी न कहती होऊँ। फिर भी तुम कहते हो, तुम्हें मजबूर किसने किया? तुम तो कवि हो, तुम इतने भाव-शून्य कैसे हो गये? मजबूरी के सिवा आज मुझे कौन यहाँ खींच लाया? आज मेरी यहाँ आने की जरा भी इच्छा न थी; पर यहाँ मौजूद हूँ। मैं तुमसे सल्य कहती हूँ, धर्म का रहा-सहा महत्त्व भी मेरे दिल से उठ गया। मूर्खो को यह कहते हुए लजा नहीं आती कि मजहब खुदा की बरकत है। मैं कहती हूँ, यह राय कोप है-दैवी वज्र है, जो मानव-जाति के सर्वनाश के लिए अवतरित हुआ है। इसी कोप के कारण आज मैं विष का घूँट पी रही हूँ। रानी जाह्नवी-जैसी