एक दिन एक व्यक्ति बोला--"दादा तुम तो हो पूरे कन्नौजिया लेकिन तुम्हारा बबुआ (पुत्र) सबके साथ खाता-पीता है।"
मिश्रजी भृकुटी चढ़ाकर बोले--"सबके साथ खाता-पीता है?"
"तुम्हें ठीक मालूम है?"
"बिल्कुल ! काँग्रेसी होकर वह बिना खाये रह ही नहीं सकता।"
"लेकिन हमने तो उसे मना कर दिया था कि यह काम मत करना।"
"आपकी मानता कौन है।"
"न मानेंगे तो मैं निकाल बाहर भी करूँगा। मैं और किस्म का आदमी हूं।"
"खैर ! निकालियेगा क्या। आजकल तो यह हवा ही चल रही है।"
"सो हवा बाहर ही बाहर चलती है, मेरे घर में नहीं आ सकती। जब तक मैं जिन्दा हूँ तब तक तो कोई हवा आती नहीं, बाद को चाहे जो हो।"
रात में जब बबुआ घर आया तो मिश्रजी ने उससे पूछा--"क्यों जी, तुम, सुना है, सबके साथ खाते-पीते हो।"
"कौन कहता था?"
"कोई कहता हो, बात सच है या झूठ।"
"हाँ खाता तो हूँ।"
मिश्रजी मुँह फाड़कर बोले--"एँ।"
"हां ! क्या पेड़ा-बर्फी और बिना अन्न की मिठाई खाने में भी दोष है?"
"हूँ ! हूँ ! इसमें तो दोष नहीं है।"
"तो बस फिर ! मैं कुछ दाल-भात तो खाता ही नहीं हूँ--मिठाई खा लेता हूँ।"
"मिठाई खाने में कोई हर्ज नहीं है।"