मरने के एक वर्ष बाद ही यह भी चल बसा। तीसरे पुत्र का नाम दाराबख़ाँ था, जिसकी बाबत कहा जाता है कि जब रहीम क़ैद कर लिए गए थे तो इसका सर काट कर एक कपड़े से ढककर तर्बूज के नामपर इनके पास जेलख़ाने में भेजा गया था। चौथा दासी-पुत्र अमरुल्ला था जो कि ख़ानख़ाना की जिन्दगी में ही गत हो गया था। इनकी पुत्री का नाम जाना बेग़म था जो ख़ानदेशके सूबेदार को ब्याही थी। इसी से मालूम होता है कि रहीम का सांसारिक जीवन सुख-प्रद न था। इनको कभी भी स्थायी शान्ति नहीं मिली।
एक बहादुर सिपहसालार के अतिरिक्त रहीम बड़े ही दानी, दयालुचित्त तथा परोपकारी थे। साथ ही बड़े ही धैर्यवान् और ईश्वर-विश्वासी भी थे। इनकी सामयिक उक्ति ही इस बात की साक्षी है जिसका प्रमाण इनके दोहों में यत्र- तत्र हमें मिलता है। निम्न लिखित कुछ दोहों से हम कविवर रहीम के हृदय का परिचय देने का प्रयत्न करेंगे।
यह बात सभी जानते हैं कि रहीम एक उच्च पदाधिकारी तथा सम्पत्ति-सम्मानित महापुरुष थे। नम्र-स्वभाव तथा दयालु होने के कारण दीन-द्रव्यार्थी लोग इन्हें अकसर घेरे रहते थे। ये खुले हाथों सबको देते भी थे। अकबर के मरने के बाद जहाँगीर के समय में जब इनकी सारी सम्पत्ति राज्य ने छीन ली तो ये अतिकालतक इधर-उधर मारे-मारे फिरा किए। एक पैसा पास न था और खाना-पीना