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पृष्ठ:रहीम-कवितावली.djvu/८०

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दोहे।

रूप रहीम बिलोकि तेहि, मन जहँ-जहँ लगि जाय।
थाके ताकहिं आप बहु, लेत छुड़ाय छुड़ाय॥२३२॥
 
लिखी रहीम लिलार में, भई आन की आन।
पद कर काटि बनारसी, पहुँच्यो मगहर थान॥२३३॥[]
वहै प्रीति नहिं रीति वह, नहीं पाछिलो हेत।
घटत-घटत रहिमन घटै, ज्यों कर लीन्हे रेत[]॥२३४॥
 
सदा नगारा कूच का, बाजत आठौ जाम।
रहिमन या जग आइकै, का करि रहा मुकाम॥२३५॥
सब कोऊ सबसों करैं, राम जुहार सलाम।
हित अनहित तब जानिए, जादिन अटकै काम॥२३६॥
 
सन्तत सम्पति जानिकै, सब को सब कोइ देइ।
दीनबन्धु बिन दीन की, को रहीम सुधि लेइ॥२३७॥
समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक।
चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक॥२३८॥
 
समय दसा कुल देखिकै, सबै करत सनमान।
रहिमन दीन अनाथ को, तुम बिन को भगवान॥२३९॥


  1. कबीरदासजी के जीवन का अधिकांश काशी में ही व्यतीत हुआ था, लेकिन अन्त समय में–मरने के समय–वे मगहर चले गए थे। इसी पर रहीम जी ने यह कहा है कि जो अपनी प्रारब्धि में होता है वह होकर ही रहता है। काशी ऐसी मोक्ष-दायिनी जगह में अतिकाल तक रह कर भी कबीर को अपने प्राण मगहर जाकर छोड़ने पड़े।
  2. बालू।