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पृष्ठ:रहीम-कवितावली.djvu/७९

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रहीम-कवितावली।

रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग-पताल[]
आपु तौ कहि भीतर भई, जूती खात कपाल॥२२३॥
रहिमन पर उपकार के, करत न पारै बीच।
मास दियो शिबि भूप ने, दीन्ह्यो हाड़ दधीच॥२२४॥
 
रहिमन भेषज के किए, काल जीति जो जात।
बड़े-बड़े समरथ भए, तौ न कोऊ मरिजात॥२२५॥
रन बन ब्याधि बिपत्ति मैं, रहिमन मरै न रोइ।
जो रच्छक जननी-जठर[], सो हरि गए कि सोइ॥२२६॥
 
राम न जाते हरिन सँग, सीय न रावन साथ।
जो रहीम भावी कतहुँ, होति आपने हाथ॥२२७॥
राम-नाम जान्यो नहीं, भइ पूजा मैं हानि।
कहि रहीम क्यों राखिहैं, यम के किंकर कानि॥२२८॥
 
राम-नाम जान्यो नहीं, जान्यो सदा उपादि[]
कहि रहीम तेहि आपनो, जनम गवाँयो बादि॥२२९॥
रीति-प्रीति सब सों भली, बैर न हित मित गोत।
रहिमन याही जनम की, बहुरि न संगति होत॥२३०॥
 
रूप कथा पद[] चारु पट, कंचन दोहा लाल।
ज्यों-ज्यों निरखत अलप[] त्यों, मोल रहीम बिसाल॥२३१॥


  1. बुरा-भला।
  2. माता के पेट में।
  3. बुराई करना।
  4. महात्माओं के उपदेश,
  5. अल्प-छोटे।