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पृष्ठ:रहीम-कवितावली.djvu/८४

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सोरठे।

बिन्दु में सिन्धु समान, को कासों अचरज कहै।
हेरनहार हिरान, रहिमन आपुहि आपु मैं॥७॥[]
रहिमन नीर पखान[], बूड़ै पै सीजै नहीं॥
तैसे मूरुख ज्ञान, बूझै[] पै सूझै[] नहीं॥८॥

रहिमन कीन्ही प्रीत, साहब को भावै नहीं।
जिनके अनगन[] मीत, हमैं गरीबन को गनै॥९॥
रहिमन पुतरी स्याम, मनौ जलज मधुकर लसै।
कै धौं सालिकराम, रूपे के अरघा धरे॥१०॥
 
रहिमन जग की रीति, मैं देखा रस ऊख मैं।
ताहू मैं परतीति, जहाँ गाँठि तहँ रस नहीं॥११॥

 

 

 

  1. कहीं-कहीं यही सोरठा अहमद की कविता में भी पाया जाता है। केवल 'रहीम' के नाम की जगह पर 'अहमद' का नाम है।
  2. पत्थर,
  3. जानता है,
  4. समझता नहीं है।
  5. असंख्य।