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बरवै नायिका-भेद
दोहा।
कबित कह्यो दोहा कह्यो, तुल्यो न छप्पय छंद।
बिरच्यो यहै विचारि कै, यह बरवै रस-कंद[१]॥१॥
त्रिविध-स्वकीया।
मुग्धा—
लहरत लहर लहरिया, लहर बहार।
मोतिन जरी किनरिया, बिथुरे बार॥३॥
लागौ आनि नबेलिअहि, मनसिज बान।
मध्या—
निसुदिन चाहन चाहत, श्री ब्रजराज।
लाज जोरावरि है, बसि करत अकाज॥५॥
रहत नैन के कोरवा, चितवनि छाय।