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राजा और प्रजा।
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काम कर डालना किसीका कभी कर्तव्य नहीं हो सकता। कर्मफल अकेले हमको ही नहीं मिलेगा। उसका दुःख बहुत्तोंको उठाना पड़ेगा।

इसीसे कहते हैं और बारम्बार कहेंगे कि शत्रुताबुद्धिको आठोपहर बाहरहीकी और उद्यत रखनेके लिये उत्तेजनाकी अग्निमें अपने सम्पूर्ण सञ्चित सम्बलकी आहुति मत दे डालो, परायेपर हर समय दाँत पीस- नेवाली आदत रोककर रास्ता बदल दो। आषाढ़में आकाशचारी मेघ जिस प्रकार मुसलाधार वर्षा करनेके लिये तपी, सूखी, तृपातुर भूमिके समीप आ जाते हैं उसी प्रकार तुम भी अपने ऊँचे स्थानसे देशकी सारी जातियों सारे मनुष्यों के बीच आकर खड़े हो जाओ और अनेक दिङ्मुखी कल्याणचेष्टाके वृहत् जालमें स्वदेशको सब प्रकारसे बाँध लो, कर्मक्षेत्रको इतना उदार, इतना विस्तीर्ण करो जिसमें ऊंच, नीच, हिन्दू मुसलमान सभी वहाँ एकत्र होकर हृदयसे हृदय, चेष्टासे चेष्टाका सम्मि- लन करा सकें। हमारे प्रति राजाका सन्देह और प्रतिकूलता पग पग- पर हमारा प्रतिरोध करेगी; पर वह कभी हमें विजित या विनष्ट न कर सकेगी-हम जो होंगे ही। पागलकी भाँति चट्टानपर सिर पटक- कर नहीं, अविचलित अध्यवसायके द्वारा धीरे धीरे उसको अतिक्रम करके ऐसे अध्यवसायकी कृपासे हम केवल जयी ही न होंगे बल्कि कार्यसिद्धिकी सच्ची साधनाको देशमें बहुत समयके लिये रक्षित कर जायेंगे, आनंशली पीढ़ियों के लिये एक एक करके सम्पूर्ण कार्योके द्वार खोल देंगे।

आज जो यह बन्दियोंकी हथकड़ियों और बेड़ियोंकी कठोर झंकार सुनाई पड़ती है—दण्डधारी पुरुषों के पैरोंके प्रहारसे राजपथ काँपता हुआ चिल्ला रहा है, इसीको बड़ी भारी बात मत समझो। यदि कान लगाकर सुनोगे तो कालके महासंगीतमें यह क्रन्दन न जाने कहाँ विलीन