पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१२

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क्रूसो का गृहत्याग और तूफ़ान।


ही एकदम पिता जी के पास हाज़िर हो जाऊँगा । उनके उपदेश की उपेक्षा कर फिर कभी इस तरह की विपत्पयोधि में न धँसूँगा । तूफ़ान जितना ही सख्त होने लगा उतना ही पिता के उपदेश का मीठापन मेरे हृदय को अनुतप्त करने लगा ।

जब तक तूफान का वेग प्रबल था तब तक और उसके पीछे भी कुछ देर तक, यह सुबुध्दि मेरे हृदय पर अधिकार जमाये रही । दूसरे दिन वायु का वेग कुछ कम हुआ । समुद्र ने भी पहले से कुछ शान्तमूर्ति धारण की । मैं भी समुदयात्रा में कुछ कुछ अभ्यस्त हो चला । फिर भी उस दिन मैं बराबर गम्भीर भाव धारण किये रहा । किन्तु तब भी मेरा जी कुछ कुछ घूम रहा था और रह रह कर मुँँह में पानी भर आता था । साँझ होते होते आँधी एकदम रुक गई । सायंकाल का दृश्य अत्यन्त मनोहर देख पड़ा । सूर्य भगवान् समुद्र के ऊपर मानो सोना ढाल कर अस्त हुए । दूसरे दिन भी वैसी ही सुनहरी किरणों की शोभा विस्तीर्ण करके उदित हुए । यह देख कर मेरा चित्त फिर प्रफुल्ल हो उठा और जान पड़ा माने इस जीवन में ऐसा सुन्दर दृश्य कभी न देखा था ।

रात में मुझे अच्छी नींद आई और वमन का उद्वेग भी शान्त हो गया । मैं पूर्व दिन के उत्तुंग तरंग-भीषण समुद्र को इस समय प्रशान्त और सुन्दर देखकर विस्मित हो रहा था । तब मेरा साथी, जिसके प्रलोभन से मैं आया था, मेरे पास आकर और मेरी पीठ को थपथपाकर कहने लगा-—क्यों जी राबिन्सन ! कल ज़रा हवा तेज़ हुई थी तब से तुम खूब डरे थे ? उसकी यह बात सुनकर मैं अवाक् हो गया । भला यह क्या कह रहा है ? इतनी बड़ी आँधी इसके निकट एक तेज़ हवा मात्र है । तब न मालूम आँधी कैसी होगी ? जो हो,