पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१३१

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राबिन्सन क्रूसो।


जो बर्तन गला जाता था वह ऐसा चिकना हो गया था जैसे उस पर आप ही पालिश होगई हो।

रसोई बनाने के उपयुक्त, आग सहने योग्य, पका बर्तन जब मुझे मिला तब जो आनन्द हुआ उस आनन्द की तुलना इस संसार में किसी वस्तु से नहीं हो सकती । ऐसी साधारण वस्तु से संसार में इस तरह कभी कोई खुश न हुआ होगा। बर्तनों को ठंडा तक न होने दिया। मैंने एक हाँडी में पानी ढाल कर मांस पकाने के लिए आग पर चढ़ा दिया। मेरा अभीष्ट सिद्ध हुश्रा। यद्यपि मेरे पास कोई मसाला न था तथापि मांस का मैंने बढ़िया शोरवा बनाया। इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर मुझे बर्तनों की दिक्कत न रही। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि उन बर्तनों का कोई निर्दिष्ट आकार न था और न वे देखने ही में सुन्दर थे; केवल काम चलाने योग्य थे।

इसके बाद मुझे यह चिन्ता हुई कि धान क्योंकर कूटा जायगा। न मेरे पास ओखली थी, न मूसल था, और न लोहे का ही ऐसा कोई पात्र था जिसमें कूट कर चावल निकाले जा सके। इसके अलावा एक चक्की की भी बड़ी आवश्यकता थी। किन्तु दो हाथ मात्र उपकरण से जाँता तैयार करने की कल्पना भी पागलपन से खाली नहीं कही जा सकती। मैं किस तरह अपने उद्देश्य को सिद्ध करूँगा, यह सोच कर बड़ा ही व्यग्र हुआ। एक भी युक्ति ध्यान में न आई। मैं न जानता था कि किस तरह पत्थर काटा जाता है। दूसरी बात यह कि पत्थर काटने के उपयुक्त कोई औज़ार भी मेरे पास न था। मैंने सोचा कि यदि एक मोटा सा पत्थर का टुकड़ा मिल जाय तो उसके बीच में गड्ढा सा खोद करके