पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१३५

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राबिन्सन क्रूसो ।

क ११८ राबिन्सन क्लो। इस समय उस एकजूरी लड़के की और फ्रिका के उपकूल में जिसने बचाया था उस लम्बे जहाज़ की बात याद आने लगी । किन्तु वह तो अब मिलने का नहीं। मैं उस डोंगी की खोज में गया जो हम लोगों के जहाज़ के साथ आई थी, जिस पर सवार हो कर हम लोग डूबे थे और जो समुद्र की लहर से ऊपर आकर सूखे में उलट पड़ी थी । वह जहाँ की तहाँ पड़ी थी किन्तु समुद्र की तरलू और वायु के धक्के खाकर वह उलट गई थी। उसके आस पास चारों ओर बालू जम गई थी और पानी बहाँ से बहुत दूर हट गया था । नाब ज्यों की त्यों थी, कहीं टूटी फूटी न थी। यदि कोई सहायता करने वाला होता तो मैं खेल पेल कर किसी तरह नाव को पानी में ले जाता । इससे मेरा बहुत काम चलता । मैं सहज ही मंजिल को जा सकता। यद्यपि मैं जानता था कि नाव के सीधा करना मेरे सामथ्र्य से बाहर की बात है तथापि असाध्य साधन होता है या नहीं -यह देखने के लिए मैं जंगल से लकड़ी काट कर ले आया और उसकी टेक लगा कर नाव को उलटाने की चेष्टा करने लगा। मेरे शरीर में जितना बल था उसे लगा करके में थक गया, पर नाव को हिला तक न सका । इसके बाद नाव के नीचे की बालू खोद कर उसे उलटाने की चेष्टा करने लगा। तीन चार सप्ताह तक मैंने जान लड़ा कर परिश्रम किया, बड़ी बड़ी चेष्टायें कीं, पर सभी व्यर्थ हुईं । जब किसी तरह उसे उलटा न सका तब उस नाव की आशा छोड़ दी। किन्तु इससे कोई यह न समझे कि मैंने इसके साथ ही समुद्र पार होने की आशा भी छोड़ दी। नहीं, उपाय जितना ही