पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१४०

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वस्त्रों की चिन्ता। १२३ । | मेरे पहनने के कपड़े भी अब धीरे धीरे फटने लगे । एक भी सूती कुर्ता मेरे पास नया न था; सभी पुराने और फटे थे । नाविकों के सन्दूक में जो छींट के कई कुर्रु मिले थे उन्हीं को यत्नपूर्वक पूंजी की तरह सँभाल कर रक्खा था; कारण यह कि किसी किसी समय सूती कपड़े को छोड़ कर दूसरा कपड़ा पहना ही न जा सकता था । यद्यपि यह देश ग्रीष्मप्रधान है, किसी कपड़े की उतनी आवश्यकता नहीं, तथापि मैं नंगा रहना हर्गिज़ पसन्द न करता था । मैं यहाँ एकाकी था फिर भी अपने शरीर की मुझे आप ही लज्जा होती थी । इसके अतिरिक्त यहाँ धूप इतनी कड़ी पड़ती थी कि खुला बदन रहने से शरीर में फफेाले पड़ जाते थे। कुर्ता पहने रहने से उतनी गरमी नहीं जान पड़ती थी बल्कि कुर्टी के भीतर हवा जाने से ठंडक मालूम होती थी । मुझे एक टोपी की भी ज़रूरत थी । ली सिर धूप में फिरने से सिर में दर्द होने लगता था । यह सब सोचविचार कर मैंने एक तरकीब से काम लिया । आपने जिन पुराने कपड़ों को अकारथ समझ कर मैंने त्याग दिया था उन्हें जोड़जाड़ कर कुछ बना सकता हूं या नहीं, इसकी जाँच कर लेना मैंने उचित समझा। में रफ करने में तो अनाड़ी था ही, दर्रा के काम में और भ अनाड़ी था। इसलिए उन कपड़ों से जो कुछ बनाया वह एक विचित्र हँग की वस्तु हुई । फिर भी वह मेरे काम चलाने योग्य हो गई । मैंने अब तक जितने पशुओं को मारा था इनके चमड़ों को फेंक न दिया था, बल्कि उन्हें धूप में अच्छी तरह सुखाकर